तेजी से सिमटता जीवन स्रोत

संस्कृत में जल ,नीर, वारि अंग्रजी में वाटर के नाम से पुकारे जाने पानी की कमी से आजकल न्यूज़ पेपर रंगे हुए आते हैं, जिन ख़बरों को हम गरम चाय की चुस्की पीते हुए पढ़ जाते हैं, बिना किसी शिकन के | शायद हमारे घरों में पानी की उपलब्धता अच्छी है, जिससे इन ख़बरों पर हम ध्यान नहीं देते |

जब सातवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान में लिखा है, की पृथ्वी पर 29 (उनतीस) प्रतिशत भाग पर जमीन है, और 71 (इकहत्तर) प्रतिशत भाग पर पानी है, तो लोग क्यों इतना हाय- हाय मचाये हैं पानी बचाओ पेड़ बचाओ| ये जो जलभाग का प्रतिशत देखकर आप खुश हो लिए तो असल बात सुनिए, इस पानी में से 97 प्रतिशत पानी खारा है, उपयोग योग्य तीन प्रतिशत पानी का अधिकाश भाग बर्फ के रूप में है केवल 0.0003 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है, जिसको हम सम्हाल नहीं पा रहे हैं, और दुरूपयोग करते हुए उसे प्रदूषित जल में तब्दील कर रहे हैं |

जब पीने योग्य पानी की इतनी कम मात्रा ही हमारे पास मौजूद है, तो हम चिंतित होने और इसको बचाने की और सुरक्षित करने की बजाय, जो पानी का संतुलन बनाये रखते हैं, उन पेड़ो को भौतिक विकास को तेज़ी से बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में काट रहे है, अभी हाल ही में देखें तो मुंबई के तटीय इलाकों में बुलेट ट्रेन के ट्रेक के बीच में आने वाले पांच हज़ार मेग्रोव के पेड़ काटने की खबर आई है, ध्यातव्य है मेग्रोव वृक्ष की वह प्रजाति है, जो भूमि को बाँध कर रखती है और बारिश को संतुलित रखती हैं, ऐसे में ये वृक्ष काटे जाने पर वहां की तट की मिट्टी बह जायेगी और बाढ़ आने की सम्भावना खतरनाक स्तर पर पहुँच जाएगी| सरकार योजना में थोडा बदलाव इस सम्भावना को पहले ही ख़त्म कर सकती है ।

पानी हमारी जरुरत है और इसके बिना जीना मुमकिन नहीं है इसलिए पानी का बचाया जाना आज जरुरी है, इलाज़ से बेहतर है पहले ही सावधान रहा जाए की तर्ज पर पहले ही सावधानी रखी जाना जरुरी है, अन्यथा देरी नहीं लगेगी देश में बड़ी परेशानी आने में, मौजूदा समय में पानी की सुरक्षा के लिए दो स्तर पर उपाय होना बहुत जरुरी है और वो हैं, व्यक्तिगत स्तर पर, दूसरी सरकारी और व्यापक स्तर पर, व्यक्तिगत स्तर पर पानी का मितव्ययता से इस्तेमाल किया जावे, दूसरी और सरकारी स्तर पर पानी को सुरक्षित रखने वाली परियोजनाए बनायी जावे, और उनको तुरंत अमली जामा पहनाया जावे, पेडो की कटाई पर तुरन्त रोक लगाई जावे, अगर ऐसा नहीं होता है तो अगली पीढ़ी तो छोडिये हमारा भी जीना मुश्किल हो जाएगा ।

पीयूष जैन शास्त्री

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