इस तरह से हल हो सकती है रेप की समस्या !

0

जिस तरह हर रोज रेप की खबरों से अखबर सोशल मीडिया और न्यूज चैनल अटे पड़े हैं,उससे एक बात साफ है इस मुल्क में महिलाओं के प्रति अत्याचार ने एक महामारी का रूप ले रखा है,हर दिन किसी नई जगह से इंसान के खौफनाक रूप को दिखाने वाली खबरें आती हैं ।

अभी कल ही की तो बात है एक नौ महीने की बच्ची से रेप की कोशिश में नाकाम रहने पर उसकी हत्या की खबर सुर्खियों में थी,उससे ठीक एक दिन पहले चार साल की बच्ची से रेप की खबर सुर्खियों में थी और दस दिन पहले अलीगढ़ के टप्पल में एक ढ़ाई साल की बच्ची से रेप कर उसकी हत्या की खबर पर देश का गुस्सा और टेलीविजन का न्यूज ऐंकर उबल मार रहा था ।

आखिर क्यों इस बात को नहीं मान लिया जाता कि महिलाओं को लड़कियों को और बच्चियों को समझाने से पहले इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत है पुरूषों को लड़कों को और बुढ्ढों को समझाने की उन्हें ये शिक्षा देने की कि महिलायें भी इंसान हैं जीती जागती चलती फिरती उन्हें भी आजादी से जीने का उतना ही अधिकार है जितना तुम्हें है ।

किसी ना किसी जघन्य वारदात के बाद अक्सर सब कुछ हाईलाइट हो जाते है, सख्त कानून, कड़ी कार्रवाई की बातें होने लगती हैं, कड़ी निन्दा,कठोर शब्दों में भर्त्सना चारों तरफ से आने लगती है कभी वालीवुड कभी टॉलीवुड कभी नेताओं की तरफ से आर्दशवाद की चाशनी में शब्द लपेटकर परोसे जाने लगते हैं,पर क्या इससे कुछ बदलता है क्या सच में इससे कोई फर्क पड़ता है?

दरअसल नहीं बिलकुल भी नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आदत हो चली है हमारे समाज को दो-तीन दिन हल्ला मचाकर खामोश हो जाने की,मुजरिम के गिरफ्तार हो जाने के बावजूद भी सालों केस चलता है,केस में सजा सुना भी दी जाये तो पहले हाईकोर्ट फिर सुप्रीम कोर्ट में फिर से सालों लग जाते हैं फाईनल सजा डिक्लेयर होने में, निर्भया रेप कांड के वक्त तो एक नया कानून तक बना पर क्या उसके बाद बलात्कारों का सिलसिला थमा है?

हर बार सिस्टम और सरकार को कोसने भर से काम चल सकता है? जल्द ही सब खामोश होकर अगले किसी हादसे का इंतजार करने लगते हैं ताकि फिर से यही सब दोहराया जा सके ।

आज जरूरत है सरकार और समाज के साझा प्रयासों से ग्रामीण स्तर से लेकर मैट्रो सिटी तक में स्कूलों में एक नये सब्जेक्ट के तौर पर ह्यूमन नेचर को पढ़ाये जाने की कि कैसे और क्यों इंसान जानवरों से बेहतर और कब वो हैवानों को पीछे छोड़ देता ये हमें अपने बच्चों को समझाना पड़ेगा,खासकर मर्दानगी को लेकर जिन धारणाओं को गढ़ दिया गया है उन्हें तोड़ने की,उसके लिए जरूरी है हमारी सरकार और सेंसर बोर्ड भी ज्यादा सेंसिटिव हो फिल्में और टीवी ही नहीं बेब सीरिज तक को सेंसर किया जाये और महिलाओं के प्रति कामुकता को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया जाये ।

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम कच्चे जहनो पर पड़ने वाले गलत प्रभावों को नजर अंदाज नहीं कर सकते, मौजूदा वक्त में कानून और न्याय व्यवस्था में इस तरह के मामलों को निपटाने के लिए अलग से व्यवस्था करने की जरूरत है, जिसमें सेवा निवृत्त न्यायधीशों को साथ लेकर नया विभाग बनाया जा सकता है,टेलीविजन और इंटरनेट का व्यापक इस्तेमाल होना चाहिए जागरूकता फैलाने के लिए और सिनेमा हॉल में 52 सेकैंड के राष्ट्रगान के बाद एक दो मिनट का इसी विषय से जुड़ा विज्ञापन दिखाना अनिवार्य कर देना चाहिए ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here