काम नहीं आया अमित शाह का धरना………..

भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड मामले में आज 13 साल की सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया, स्पेशल कोर्ट ने कहा CBI उतने सबूत नहीं जुटा सकी जिससे आरोपियों पर आरोप सिद्ध हो

इस मामले में मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी के अलावा पांच अन्य पर इलजाम थे,सभी आरोपियों मुख्तार अंसारी, मुन्ना बजरंगी,संजीव महाश्वरी,एजाजुल हक,राकेश पाण्डेय,रामू मल्लाह,मंसूर अंसारी,और अफजाल अंसारी के खिलाफ CBI पर्याप्त सबूत नहीं जुटा सकी जिसके चलते आज इन सबको बरी कर दिया गया ।

2005 में जब ये वारदात हुई थी उस वक्त इसने भारत की राजनीति में हलचल मचा दी थी,उस समय आज के मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह इस हत्याकांड के विरोध में धरने पर बैठ गये थे, उनके धरने के बाद ही इस हत्याकांड की जांच CBI को सौंप दी गयी थी ।

इस हत्याकांड में सीधे तौर पर अंसारी बंधुओं पर आरोप लगाते हुए कहा गया था कि उन्ही के कहने पर मुन्ना बजरंगी ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया था ।

कहा ये भी जाता है कि कृष्णानंद राय मुख्तार अंसारी के खास दुश्मन माफिया डॉन बृजेश सिंह के बेहद करीबे थे जिसके चलते इस टकराव की स्थिति पैदा हुई और नतीजन कृष्णानंद राय को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा,इसी हत्याकांड के आरोपी मुन्ना बजरंगी की भी जेल में हत्या कर दी गयी ।

परिवारवाद,लोकतंत्र,और भारत

भारत निर्विवादित रूप से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाने वाला देश

लोकतंत्र की खूबी होती है कोई भी आम आदमी जिसमें नेत्तृव की क्षमता हो सत्ता के सर्वोच्च पद तक जा सकता है जिसकी ताजा मिसाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं,इनके अलावा भी हमारे और बहोत से नेता हैं जो गैर राजनैतिक पृष्ठभूमी से आते हैं जेसे मायावती,लालूप्रसाद,जोर्ज फर्नाडीस,मुलायम सिंह नितीश कुमार इन सभी नेताओं ने देश को कितना प्रभावित किया है ये हम सभी को पता है ।

वहीं हमारे इस लोकतंत्र को परिवारवाद का जो दीमक लगा है वो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है,इस हद तक कि अब तो ये भी कहा जाने लगा है “हमारे  नेता बनते नहीं हैं बल्कि पैदा होते हैं” और ये बात लोकतंत्र के लिए बड़ी खतरनाक है, ये सच है किसी भी व्यक्ति की पहली पहचान उसका परिवार होता है पर गुजरते वक्त के साथ जैसे जैसे एक काबिल व्यक्ति खुद अपनी पहचान बनाता जाता है परिस्तिथी पलटने लग जाती है यानि वो परिवार जो कभी उस व्यक्ति की पहचान होता था अब  उस व्यक्ति से उसके परिवार की पहचान होने लग जाती है,पर इसके लिए जरूरी है वो अपनी पूरी क्षमता से अपने परिवार की सबसे बेहतर पहचान रखने वाले व्यक्ति से भी आगे निकल जाये जो कि हमेशा मुमकिन नहीं हो पाता ।

ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने वो मुकाम पाया जो उस से पहले उस परिवार में किसी सदस्य को हासिल नहीं था पर उसी परीवार का दूसरा व्यक्ति वो मुकाम नहीं हासिल कर पाया, प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन का परिवार इस बात को समझने के लिए एक बेहतर उदाहरण है इस बात को समझने के लिए,कवि हरिवंश राय बच्चन का शुमार देश के चोटी के कवियों में होता है पर उनके पुत्र ने जो मुकाम पाया वो शायद ही किसी ने सोचा हो आज वे विश्व प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन के नाम से जाने जाते हैं पर शुरुवाती दौर में उनको भी कठिन संघर्ष करना पड़ा था क्योंकी वो जिस क्षेत्र में थे,वहाँ उनको अपनी पहचान खुद ही बनानी थी और वे संघर्ष के साथ अपनी क्षमताओं का भरपूर उपयोग करते हुये आखिरकार कामयाब हुये।

अब जिस मुकाम अमिताभ बच्चन थे वहाँ से उनकी संतान को एक बहोत बड़ी पहचान मिली पर उनको सुपुत्र अभिषेक बच्चन अपने पिता के भरपूर सहयोग के बावजूद भी कामयाब नहीं हो सके,वजह क्या रही ये अलग बहस का विषय हो सकता है पर सिर्फ पिता और परिवार के नाम के ही सहारे आगे नहीं बढ़ सके।

अब बात करते हैं राजनीति की लोकतंत्र की परम्परा के अनुसार जब भी कोई नेता अपनी क्षमता के दम पर राजनीति में अपनी पहचान बनता है तो उसके संघर्ष से सिर्फ उसे ही नहीं देश  और लोकतंत्र को भी फायदा होता है,अपने जमीन से जुड़े अनुभवों से वो बेहतर ढ़ंग से देश,समाज और लोकतंत्र को जान और समझ सकता है और फिर उसी अनुरूप वो देश के भविष्य का निर्धारण बेहतर ढ़ंग से कर सकता है,किसी भी नेता की बस इतनी पहचान होना कि ये फलाँ परिवार से आता है ना सिर्फ लोकतंत्र के लिए खतरा है देश की दशा और दिशा के भी बेहद खतरनाक साबित होता है इतना याद रखें ये देश है करोडों लोगों की आबादी वाला देश कोई प्रयोगशाला नहीं।

सैय्यद असलम अहमद

क्या अखिलेश यादव की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं ?

बेगूसराय में यदि तेजस्वी यादव चाहते तो वाहवाही लूटने के लिए कन्हैया कुमार को राजद का समर्थन दे देते और राजद प्रत्याशी तनवीर हसन साहब भी शायद इसे हंस कर स्वीकार कर लेते। इसके बाद कप्हैया की जीत सुनिश्चित थी। लेकिन लेकिन जीत ही राजनीति का अंतिम सत्य नहीं है, विचारधारा के भी अपने मायने हैं। तेजस्वी के दिमाग में लालू यादव जी की वैचारिक प्रतिबद्धता हिलोरें मार रही थी। इसलिए उन्होंने कन्हैया की जीत के बजाए हार का रिस्क लेकर तनवीर साहब को उम्मीदवार बनाया। तेजस्वी की नजर में हार जीत का नही वैचारिक प्रतिद्धता मायने रखती है। इसलिए उनका राजनीतिक कद निरंतर बढ़ता जा रहा है।

फोटो:तेज बहादुर यादव की फेसबुक वाल से

दूसरी तरफ अखिलेश यादव जी को देखें। उन्होंने बनारस से अपनी जमीनी कार्यकर्ता उम्मीदवार शालिनी यादव को हटा कर तेजबहादुर यादव को उम्मीदवार बनाने का फैसला कर लिया। जाहिर है कि अखिलेश की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है। जमीन से जुड़ी शालिनी के बजाये स्काई लैब तेजवहादुर यादव को उम्मीदवार बनाने की मंशा से उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता के चीथडे उड़ जा रहे है, लेकिन उनको इससे क्या? उन्हें नहीं मालूम की मुसलमानों का दर्द क्या है। एक घोषित मुस्लिम विरोधी को भला कोई मुसलमान क्यों कर वोट करेगा?

मुझे याद है कि अयोध्या गोली कांड के बाद नेता जी (मुलायम सिंह जी) ने यूपी के सपा जिला अध्यक्षों/ मंत्रियों, विधायकों और हारे प्रत्याशियों की संयुक्त बैठक बुलाई थी। बैठक में नेता जी ने कहा था, वह जानते हैं कि गोली चलाने के बाद होने जा रहे रहे चुनाव में सपा का जीत पाना मुश्किल है, लेकिन हम मुद्दों से समझौता नहीं करेंगे, आप भी न करें। वैचारिक दृढ़ता आज नहीं तो कल और उसके बाद आने वाले तमाम कल में हमें जीत जरूर दिलायेगी। यही कटु सत्य है। इतिहास गवाह है कि नेता जी ही सही साबित हुए।

अब तेजबहादुरवादियों और अखिलेश जी से मेरा सवाल है? शालिनी यादव जो जनता के बीच रहने वाली हैं, उनका टिकट काट कर तेजबहादुर को टिकट क्यों? अखिलेश जी आपकी राजनीतिक सोच बहुत भ्रमित है। बनारस में मोदी से लड़ कर शालिनी भी हारेगी और तेज बहादुर भी हारेंगे। फिर शालिनी का टिकट बदल क्यों रहे। क्यों उस आदमी को टिकट दे रहे जिसकी भाषा घोर सयाम्प्रदायिक और समाज तोड़क है।

अखिलेश जी आप समझदार हैं। आपकी यहीं बेवकूफी वाली नीति अन्ततः आपको नेता जी यानेी आपके पिता जी से अलग कर देंगी। फिर आप एक मंडल के नेता बनके रह जायेंगे। देश का नेता बनने के लिए आप नेता जी यानी मुलायम सिंह जी से सबक लीजिए, या फिर अपने से छोटे तेजस्वी से समाजवाद का पाठ सीखिए। बाकी आप समझदार हैं।
आप से कभी नहीं मिल पाने वाला और नेता जी का गिरेबान पकड़ कर सच बतमाने वाला एक समाजवादी।

लेखक – नज़ीर मालिक (वरिष्ठ पत्रकार ) 

अखिलेश यादव की जीत को ऐतिहासिक बनाने में जुटे हैं अब्बास अंसारी,निरहुआ को कहा ‘ये कौन है’?

आज़मगढ़/मुख्यालय

जैसे जैसे लोकसभा चुनाव की तारीख़ क़रीब आरही है वैसे वैसे सियासी सरगर्मियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं तमाम पार्टियों के नेतागण अपने अपने तरीक़े से जनता को लुभाने में हर दाँव पेंच इस्तेमाल करने में लगे हैं।

यूपी की स्पेशल लोकसभा सीटों में शुमार आज़मगढ़ से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ख़ुद गठबंधन के प्रत्याशी हैं जिसकी वजह से इस सीट पर मीडिया के साथ साथ जनता की भी ख़ास नज़र बनी हुई है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी अलग पहचान रखने वाले बहुजन समाज पार्टी के मऊ से बाहुबली विधायक मुख़्तार अंसारी के बड़े बेटे अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज़ अब्बास अंसारी लगातार आज़मगढ़ के दौरे करके माहौल को गठबंधन के पक्ष में करने की पूरी कोशिश में लगे हुए हैं।

बताते चलें कि अब्बास अंसारी के बडे़ अब्बा पूर्व सांसद अफ़जाल अंसारी ख़ुद ग़ाज़ीपुर लोकसभा से गठबंधन के प्रत्याशी हैं उसके बावजूद अब्बास अंसारी ग़ाज़ीपुर के साथ साथ अखिलेश यादव की आज़मगढ, सलेमपुर, घोसी’, जौनपुर, बलिया, लोकसभा सीट पर जी जान से मेहनत कर रहे हैं जिससे युवाओं में गठबंधन के प्रति झुकाव भी तेज़ी से बताया जा रहा है।

आज फिर अब्बास अंसारी अचानक आज़मगढ़ लोकसभा की सगड़ी और गोपालपुर विधानसभा में गाँव गाँव जाकर लोगों से सीधे मिल रहे हैं।

सगड़ी और गोपालपुर विधानसभा के अंजानशहीद,बाग़ख़ालिस,चाँद पट्टी,सलाहुद्दीनपट्टी,करमैनी,बिलरियागंज,सोनबुज़ुर्ग,छीहीं एवं सदर विधान सभा के कोट और परसपूरा में जगह जगह रुक रुक कर लोगों से घुलमिल कर उनसे सीधे चर्चा कर रहे हैं और सपा-बसपा गठबंधन को पूरे प्रदेश में मज़बूत करने के लिए जोश भर रहे हैं।

अब्बास अंसारी अपने संबोधन मे मुख्य रूप से संविधान और लोकतंत्र बचाने की अपील करते हुए कहते हैं कि अब समय आगया है की देश से सामंतवादी और दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकों’, नौजवानों, किसानों’, बुनकरो, व्यापारियो, की विरोधी भाजपा सरकार को उखाड़ फेंका जाए और अखिलेश यादव को आज़मगढ़ लोकसभा से अधिक से अधिक मतों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज करवाकर बहन जी के हाथो को और गठबंधन को मजबूत करें।

बातचीत में अब्बास अंसारी ने कहा की मैं बहन जी के आदेश पर आज़मगढ़ आया हूँ और यहाँ के लोगों से मिल कर अखिलेश यादव जी की जीत को ऐतिहासिक जीत बनाने की अपील कर रहा हूँ,ये पूछे जाने पर की भाजपा प्रत्याशी निरहुआ क्या कर पाएँगे अखिलेश यादव के सामने इसके जवाब में अब्बास अंसारी ने उलटा मीडिया से ही सवाल किया की ये कौन है? कोई गवैया है.अब्बास अंसारी के जनसम्पर्क मे युवाओं की भारी भीड़ रही।

अब्बास अंसारी के जनसंपर्क और जनसंवाद के दौरान पूर्व ब्लाक प्रमुख चंद्रशेखर यादव,पूर्वमण्डल कोआर्डिनेटर सुभाष गौतम,सपा नेता अजय यादव,ज़ोरावर खान,जयराम पटेल,अब्दुल हक़,ज़िला पंचायत सदस्य शहबाज़ खान,अब्बास अंसारी के प्रतिनिधि बृजेश जायसवाल,मिंटू राय,राजेश राय प्रधान,विकास सिंह,अफ़जल खान,नीरज सिंह,मक़बूल खान,तारिक खान,दानिश खान प्रधान,विधान सभा अध्यक्ष सपा बसपा सगड़ी, गोपालपुर और सदर विधानसभा के सैकड़ों समर्थक भी मौजूद रहे।

बुलंदशहर :नजरबंद हुये बीजेपी सांसद भोला सिंह डीएम लगाई ने पोलिंग बूथ जाने पर रोक

आवाम की आवाज़ ब्यूरो –

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से बीजेपी के मौजूदा सांसद और प्रत्याशी भोला सिंह के खिलाफ कार्यवाही करते हुए डी एम श्री अभय ने उनके किसी भी पोलिंग बूथ पर जाने पर रोक लगा दी ,भोला सिंह के खिलाफ मतदान को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप है ।

बुलंदशहर में जारी मतदान के दौरान जब सांसद भोला सिंह एक पोलिंग बूथ पर पोंहचे और ईवीएम के पास जाने लगे,तब वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी देवचंद्र ने उन्हें रोकने की कोशिश की जिससे सांसद जी नाराज हो गये और उन्होंने डीएम को फोन लगाकर सुरक्षाकर्मी की शिकायत डीएम श्री अभय द्वारा दी गयी इजाजत के बाद भोला सिंह अंदर दाखिल हो गये ।

सांसद भोला सिंह ने कोड ऑफ कंडक्ट के खिलाफ पार्टी का चुनाव निशान पहन रखा था और कोड ऑफ कंडक्ट के खिलाफ जाकर वे अंदर जाकर वोटरों से भी मिले उनके साथ तस्वीरें खिंचवाई वहां मौजूद कुछ नौजवानों द्वारा इसे पूरे मामले की वीडियोग्राफी कर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया जिसके बाद मामला तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है

सात विधानसभा वाली बुलंदशहर लोकसभा सीट से 2014 में पहली बार चुनकर आने वाले भोला सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए डीएम श्री अभय ने उनको मतदान तक नजरबंद करने का आदेश दे दिया ।