धोनी जिसे कहते हैं…..

एक लंबे बालों वाला एक लड़का भारतीय क्रिकेट टीम में आता है, आड़े तिरछे शाट्स खेलता है…..लोग कहते हैं ये क्या खेलेगा ? ये लम्बे बालों वाला क्या कीपिंग करेगा ? लेकिन लोगों को क्या पता था कि ये भारतीय क्रिकेट इतिहास में ऐसा नाम करेगा कि उसके जैसा न कोई था, न कोई है, न कोई होगा…..!!!!!

2007 वर्ल्ड कप में बांग्लादेश से हारकर बाहर हो जाना और इंग्लैंड से सीरीज हारने के बाद द्रविड ने कप्तानी छोड़ दी और कप्तानी दी गई उसी लम्बे बालों वाले लड़के को जो अब तक बैटिंग में अपना लोहा मनवाना शुरू कर चुका था, और शुरू हुआ टी-20 विश्व कप, जिसको एक बेहद युवा टीम के साथ जीतकर इस लम्बे बालों वाले खिलाड़ी ने अपनी कप्तानी का बिगुल फूंक दिया और शुरू हुआ भारतीय क्रिकेट इतिहास का स्वर्णिम युग…..लेकिन अब वो खिलाड़ी लम्बे बालों वाला नहीं रहा, अब उसने बाल कटवा लिये थे…..!!!!!
दादा ने टीम को लड़ना सिखाया तो धोनी ने जीतना…..!!!!!

उस समय आस्ट्रेलिया ऐसी टीम थी जो अजेय थी, मैं तो ये इंतजार करती कि इंडिया आस्ट्रेलिया को कब हरायेगा, और 2008 की ट्राई सीरीज आस्ट्रेलिया में ही जीत कर सबको ये भी बता दिया कि ये नया भारत है, घर में घुसेगा भी और मारेगा भी…..!!!!!
2011 विश्व कप तो किसको ही भूलेगा, वो आख़िरी छक्का और वो लाइन,
Dhoni finishes off in style, magnificent strike into the crowd…..India lift the world cup after 28 years and party starts in the dressing room and it’s an Indian Captain who has absolutely been magnificent in the night of the final…..

इस खिलाड़ी के बारे में जितना लिखो उतना कम होगा,
हाथों से ग्लव्स को टाइट करते हुये पूरी फील्ड को देखना और फिर आँखों को अंगूठे से हल्का सा रगड़कर दोनों कंधों को एक बार उचकाने के बाद जब खेलने के लिये तैयार होता है तो पूरा देश इस खिलाड़ी की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहा होता है…..और उसके बाद जब हेलीकाप्टर उड़ता है तो पूरा देश उछल पड़ता है…..!!!!!
धोनी ने तो देश को वो दे दिया जो शायद हम कभी सोच भी न पायें…..!!!!!

लेकिन धोनी होना भी इतना आसान कहाँ है !
धोनी होने के लिये आपको लोगों की टूटती उम्मीदों को जोड़ना होता है, जमीन पर खड़े होकर हेलीकाप्टर उड़ाना होता है, टूटे अँगूंठे के साथ खेलना पड़ता है, बिना देखे गेंद को स्टंप्स में मारना पड़ता है, पलक झपकने से पहले गिल्लियाँ बिखेर देना होता है…..कोई कितना कुछ बोल ले लेकिन उस पर कोई प्रतिक्रिया न देना और मैदान में जवाब देना होता है धोनी होना…..धोनी होने के बाद भी सबसे मुश्किल काम ये है कि धोनी होकर भी धोनी बने रहना…..!!!!!
मेरे लिए क्रिकेट तभी पूरा होता है ,जब तीन डण्डों के पीछे खड़ा धोनी आंखों से सुन और हाथों से बोल रहा हो…..जब सबके माथे पर पसीने की बूंदे हों उस वक्त में भी शान्त रह कर मैच को जीत कर ले आना होता है धोनी होना…..!!!!!

जिसने देश को माता पिता माना, माँ की गोदी से ज्यादा वक्त क्रिकेट मैदान पर बिताया, देश के लिए खेलने का सपना कब जिम्मेदारी में बदल गया पता ही नहीं चला, युवा टीम को लेकर अपनी चतुराई से ट्वेंटी वर्ल्ड कप दिला दिया, टीम को टेस्ट में नंबर 1 का ताज पहनाया और एशिया कप में एशिया का स्टार बना दिया…..परन्तु अभी उसकी जिम्मेदारी पूरी नहीं हुई थी अभी एक सूखे को खत्म करना था जो सालो से चला आ रहा था, अभी क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को उनके सपने के साथ विदाई देनी थी, सबके सहयोग बेहतरीन टीम संयोजन और करोड़ों लोगों की दुआओ से उसने ये भी कर दिखाया और भारत को वर्ल्ड कप दिलाकर सबको उत्सव मनाने का मौका दिया…..!!!!!
2011 के बाद भारत को मिल रही लगातार हार पर विचार किया और टीम में सीनियर खिलाड़ियों के साथ विराट, रोहित,धवन जैसे नए खिलाड़ियों को मौका दिया उनको तरासा और तैयार किया और एक मजबूत बेंच स्ट्रेंथ दिया…..ताकि सीनियर खिलाड़ियों के जाने के बाद टीम का हाल श्रीलंका या अफ्रीका जैसा ना हो जैसा की आज उनका है…..उसकी इस दूरगामी सोच ने आज भारत को विश्व की सबसे मजबूत टीम बना दिया…..इस सोच के लिए उसकी आलोचना भी हुई पर देश लिए सोचने वाले आलोचना की नहीं सोचते…..!!!!!

उसने कप्तानी भी छोड़ दी है अब वो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गया है, अब वो मैदान पर मजे करता है, आईपीएल जीतने के बाद ट्रॉफी टीम को देकर अपनी बेटी के साथ खेलता है, वक्त पाकर मैदान पर सो जाता है, दर्शकों के साथ दौड़ लगाता है, विपक्षी टीम के खिलाड़ियों को खेल के तरीके सिखाता है, उसे अब किसी चीज की फिकर नहीं है, जब तक वो मैदान पर है वो हर एक पल जीना चाहता है, उसको करने दो जो कर रहा उसके बारे में सोचना बंद कर दो…..वो वह बाप है जो अपने परिवार को मजबूत और आने वाली पीढ़ी को अपने पैरो पर खड़ा कर चुका है…..!!!!!

तुम उसको कुछ बोलो वो तो बहरा है…..उसे अपने चाहने वालो से ही नहीं पूरे देश से लगाव है…..आलोचक वहीं मिट्टी में मिल जाते है जब वो ग्राउंड में पहला कदम रखता है और हजारों लोग खड़े होकर उसका स्वागत करते है…..!!!!!

धोनी वो इंसान है जो ‘कप्तान धोनी’ के नाम से ही जाना जायेगा, वो भले ही कप्तानी छोड़ दे लेकिन खुद कप्तानी उसको छोड़ नहीं सकती…..वो इकलौता माही है…..!!!!!

क्रिकेट पहले भी खेला जाता था,
क्रिकेट आगे भी खेला जायेगा…..लेकिन आँखों में जीत का भरोसा लिये एक इकलौता सा इंसान शायद अब क्रिकेट को अलविदा कह दे…..तुम उसको कितना भी बोल लो, लेकिन जिस दिन धोनी रिटायर होगा न, उस दिन पूरे देश के साथ वो बाइस गज की पट्टी और वो तीनों ड़डे भी रोयेंगे, जिसके पीछे वो 15 साल से खड़ा है…..

जब जब इस बाइस गज की पट्टी और विकेट के पीछे खड़े खिलाड़ियों की बात होगी, तब तब एक नाम सबसे पहले लिया जायेगा…..वो नाम है…..महेन्द्र सिंह ‘धोनी’…..

याद रखना एक हार से कोई फकीर नहीं बनता,
और एक जीत से कोई सिकन्दर नहीं बनता…..सिकन्दर बनने के लिये पहले धोनी बनना पड़ता है!!!

Shefta Parveen

बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी को स्पेशल कोर्ट ने किया बाइज्जत बरी ।

बीजेपी MLA कृष्णनंदन राय के हत्या के आरोप से आज CBI स्पेशल कोर्ट ने मुख्य आरोपी मुख्तार अंसारी समेत सभी पाँचो आरोपीयों को आरोप मुक्त कर दिया ।

गौर तलब है बसपा विधायक मुख्तार अंसारी समेत इस मामले में पांच लोगों को आरोपी बनाया गया था जिसमें से एक आरोपी मुन्ना बजरंगी की जेल में हत्या कर दी गयी थी ।

‘सुमय्या ख़ान’ को अब ‘ सुभाष जैन’ के लिए ‘सर’ या ‘अंकल’ जैसे औपचारिक सम्बोधनों की ज़रूरत नहीं थी…अब वो उसके ‘पापा’ थे! प्यारे पापा!

जन्मदिन मुबारक पापा ! आप मेरे लिए क्या हैं! आपका होना मेरी ज़िन्दगी में क्या मा’नी रखता है! आपसे कितना लगाव है!…इन सब बातों की चर्चा करना अब बस एक औपचारिकता लगती है क्योंकि ये सारे जज़्बात लफ़्ज़ों से परे हैं। कहना तो बस यही है कि “लव यू पापा”…इससे ज़्यादा और कुछ नहीं।
आपके लिए आपके पिछले जन्मदिन पे जो लिखा था उसे शेयर कर रही हूँ और वो इसलिए ताकि लोग जान सकें कि आज के इस वक़्त में जब हवा में ऑक्सीजन से ज़्यादा नफ़रत का ज़हर घुला हुआ है, आँखों पे धर्म का मोटा चश्मा चढ़ा हुआ है…कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका मज़हब सिर्फ़ मुहब्बत है और दिल इबादतगाह।

18.6.2018:

कहते हैं कि आप जिनसे बहुत ज़्यादा मुहब्बत करते हैं उनके लिए लिखना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि आप बावजूद कोशिशों के काग़ज़ पे वो एहसास नहीं उतार पाते जो आप उस शख़्स के लिए महसूस करते हैं, जज़्बात की वो शिद्दत अल्फ़ाज़ हरगिज बयान नहीं कर पाते।

बक़ौल टेनीसन :” For words like Nature
Half reveal and half conceal
The soul within “

फिर भी मैंने एक छोटी सी कोशिश की है कि अपने प्यारे पापा की सालगिरह के मौके पर उनके लिए अपने जज़्बात को अल्फ़ाज़ का जामा पहना सकूँ, उन्हें बता सकूँ कि उनकी मेरी ज़िन्दगी में क्या अहमियत है क्योंकि मैं शायद कभी रूबरू या फोन पे ये सारी बातें न कह पाऊँ और शायद इससे बेहतर तोहफ़ा भी मैं उन्हें न दे पाऊँ…

कई दफ़ा ज़िन्दगी हमें बिन माँगे इतने ख़ूबसूरत तोहफ़े थमाकर चली जाती है कि हमें उसका एहसास भी नहीं हो पाता। आप भी मेरे लिए ज़िन्दगी से मिले उन्ही ख़ूबसूरत तोहफ़ों में से एक हैं पापा! अभी कल ही की तो बात है- आप मेरे लिए बिल्कुल अजनबी थे…फिर मैंने आपको ‘सर’ कहना शुरू किया, फिर ‘अंकल’ और फिर पिछले बरस (2017) का धुंध में लिपटा दिसम्बर हमारे बीच की सारी धुंध साफ़ कर गया। ‘सुमय्या ख़ान’ को अब ‘ सुभाष जैन’ के लिए ‘सर’ या ‘अंकल’ जैसे औपचारिक सम्बोधनों की ज़रूरत नहीं थी…अब वो उसके ‘पापा’ थे! प्यारे पापा!

पिछले बरस कितने अजीब इत्तेफ़ाक़ हुए मेरे साथ! ख़ुदा ने दो बहुत ख़ूबसूरत तोहफ़े मुझे अता किये। दो ऐसी शख्सियतों की ज़िन्दगी का अहमतरीन हिस्सा बनी जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था…और वो भी उन्हें बिना देखे, उनसे बिना मिले। लेकिन ये दोनों शख्सियतें अब इस तरह से मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा हो गयी हैं मानों हम पिछले कई बरसों से एक-दूसरे को जानते हों। और पापा! आप तो हमेशा कहा करते हैं कि “तुम या तो पिछले जनम में मेरी माँ थीं या मेरी बेटी!”
कभी-कभी मेरे लिए इन सबका यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है। कभी सोचने बैठूँ तो लगता है मैं सपने में हूँ और मेरी नींद खुलते ही ये सपना ख़त्म हो जाएगा।

कहते हैं एक बेटी के लिए पिता का होना सर पर छत का होना है…आसमान का होना है! और इस मुआमले में मैं शायद बहुत ज़्यादा ख़ुशकि़स्मत हूँ क्योंकि एक तो संयुक्त परिवार में रहने की वजह से अब्बू और छोटे अब्बू दोनों से बराबर का प्यार मिला…कभी चाचा और पिता के बीच का फ़र्क़ ही समझ नहीं आया…और फिर मुझे आप मिले। ख़ुदा से मिली इन नियामतों के बदले शुक्रिये का लफ़्ज़ बहुत छोटा महसूस होता है। ख़ुदा ने मुझे जो आसमान दिया है वो बहुत वसी’अ ( विस्तृत) है जिसमें कई प्यार करने वाले चेहरे सितारे बनकर टिमटिमा रहे हैं।

पापा! आपके रूप में मुझे सिर्फ़ एक पिता ही नहीं, एक दोस्त और एक माँ भी मिली। आपसे मैं एक दोस्त की तरह सारी बातें शेयर कर सकती हूँ और आप भी एक दोस्त की तरह मेरी बातें समझते हैं, मुझे सलाह देते हैं नसीहत नहीं। आपने कभी मुझपर अपनी सोच थोपने की कोशिश नहीं की। मुझे ख़ुद पर और अपने फ़ैसलों पर भरोसा करना सिखाया।
और कभी आप बिल्कुल एक माँ बन जाते हैं…माँ की तरह ही मेरा मन समझते है…सिर्फ़ मेरी आवाज़ सुनकर आप मेरे मूड का अंदाज़ा लगा लेते हैं। कभी-कभी तो मैं हैरान हो जाती हूँ कि ऐसा कैसे मुमकिन है! वाक़ई दिल के रिश्ते समझना और उनकी कैफ़ियत बयान कर पाना बहुत मुश्किल होता है।

आज के वक़्त में जब धर्म, स्वार्थ और राजनीति ने सारे माहौल को ज़हरीला बना दिया है, जब किसी अंजान शख़्स पर भरोसा करने से लोग डरने लगे है, जब ख़ून के रिश्ते भी औपचारिक होकर रह गये हैं…ऐसे वक़्त में हमारा रिश्ता किसी नवजात बच्चे की तरह मासूम और निःस्वार्थ है। किसी तपते रेगिस्तान में नखलिस्तान ( मरुद्यान) की तरह है। सूरज की तपिश से झुलसती ज़मीन के चेहरे पर पहली बारिश की फुहार की तरह है। अँधेरी रात में किसी जुगनू की तरह है। हमारा रिश्ता भले ही इस पूरे परिदृश्य को न बदल सके लेकिन बदलाव की ओर बढ़ते हज़ारों क़दमों में से एक क़दम ज़रूर है।

आख़िर में जन्मदिन की ढेर सारी मुबारकबाद पापा! ख़ुदा से बस यही दुआ है कि आपका हाथ हमेशा मेरे सर पर बना रहे । आपकी बेटी जताना नहीं जानती लेकिन वो आपसे बहुत प्यार करती है। लव यू पापा ! ❤❤”

आपकी बेटी ;  ‘सुमय्या ख़ान’

पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब लरज़ती हुई ज़ुबान में कहते हैं…

यह पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब का आख़री ख़ुत्बा है जिसे उन्होंने खुद घूम घूम कर तीन बार कहा था,क्योंकि यह वह सबसे ज़रूरी बात थी,जिन्हें आखिर में ही कहा जाना था ताकि कयामत तक मत भूलो ।मगर अफसोस कि यह न बताया जाता है, न सुनाया,याद रखना तो बहुत दूर की कौड़ी है।

पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद साहब लरज़ती हुई ज़ुबान में कहते हैं

मेरे प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कहूँ, ध्यान से सुनो। ऐ इंसानो! तुम्हारा रब एक है।

अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत को मजबूती से पकड़े रहना।

लोगों की जान-माल और इज़्ज़त का ख़याल रखना, ना तुम लोगो पर ज़ुल्म करो, ना क़यामत में तुम्हारे साथ ज़ुल्म किया जायगा।

कोई अमानत रखे तो उसमें ख़यानत न करना। ब्याज के क़रीब न भटकना।

किसी अरबी को किसी अजमी (ग़ैर अरबी) पर कोई बड़ाई नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर, प्रमुखता अगर किसी को है तो सिर्फ तक़वा(धर्मपरायणता) व परहेज़गारी से है अर्थात् रंग, जाति, नस्ल, देश, क्षेत्र किसी की श्रेष्ठता का आधार नहीं है। बड़ाई का आधार अगर कोई है तो ईमान और चरित्र है।

तुम्हारे ग़ुलाम, जो कुछ ख़ुद खाओ, वही उनको खिलाओ और जो ख़ुद पहनो, वही उनको पहनाओ।

अज्ञानता के तमाम विधान और नियम मेरे पाँव के नीचे हैं।

इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़ून खत्म कर दिए गए। (अब किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं) और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान का ख़ून–रबीआ इब्न हारिस का ख़ून– ख़त्म करता हूँ (यानि उनके कातिलों को क्षमा करता हूँ)|

अज्ञानकाल के सभी ब्याज ख़त्म किए जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्न मुत्तलिब का ब्याज ख़त्म करता हूँ।

औरतों के मामले में अल्लाह से डरो। तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर बराबर का अधिकार है।

औरतों के मामले में मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ।

लोगो! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्हारे बाद कोई उम्मत नहीं।

आज मैंने तुम्हारे लिए दीन को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी”

यही धर्म है, जिससे इस्लाम के मानने वाले कोसों मीलों दूर हो चुके हैं ।इधर उधर की नुक़्ताचीनी की जगह,शिकवे शिकायत की जगह अगर यह अपनी ज़िन्दगी में इस आख़री मश्विरह को ही मान लें,तो ज़िंदगियां सँवर जाएँ । मैं तो चाहता हूँ कि अगर तुम हिन्दू हो तो राम-कृष्ण तुम्हारे चरित्र से झलकें । तुम ईसाई हो तो ईसा,यहूदी हो तो मूसा और अगर मुसलमान हो तो मोहम्मद तुम्हारे आचरण में हों । हाँ इसपर भी अगर तुम्हें श्रेष्ठ मानव बनना है, तो तुम्हारे आचरण से ईसा, मूसा,कृष्ण,राम,मोहम्मद,बुद्ध, नानक सब झलकें… फ़िलहाल इस आख़री खुतबे के रट लो, जो सबके लिए है,शायद कुछ काम ही आए… #hashtag

लेखक– हफीज़ किदवई

 

पूर्व सांसद जो बीड़ी बनाकर गुजारा करते हैं !

आज के दौर में हम जब भी संवैधानिक पद पर “सुशोभित रहे” किसी व्यक्ति की बात करते हैं तब अक्सर हमारे जहनों में ऊँचे बंगले चमचमाती गाडियाँ और उसके आस पास मंडराते सुरक्षाकर्मी घूम जाते हैं,पर अपवादों की भी कमी नहीं रही है हमारे देश में, मौजूदा दौर में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को भी जनता का एक बड़ा हिस्सा इस वजह से भी पसंद करता है कि उनके वक्तव्यों में अक्सर फकीरी त्याग और ईमानदारी की झलकियां नजर आती हैं ।

पर आज हम आपको जिस व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हैं वे शायद उस वक्त सूचना प्रौद्योगिकी के उचित विकास ना हो पाने की वजह से गुमनाम से होकर रह गये,हम बात कर रहे हैं 1967 में जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव जीत “सागर” मध्य प्रदेश से सांसद रहे “रामसिंह अहिरवार” की इन्हे इलाकाई लोग साईकिल वाले नेता जी के नाम से जानते हैं,सागर के पुरव्याऊ टोली मोहल्ले की एक संकरी गली में स्थित एक साधारण से मकान में रहने वाले भूतपूर्व सांसद जी के पास दर्शनशास्र में स्नातक और अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक की डिग्री भी है ।
84 साल के रामसिंह अहिरवार आज भी हर रोज कई किलोमीटर साईकिल चलाते हैं इस उम्र में भी उनकी सक्रियता प्रेरणादायक है परंतु अब वे राजनीति में सक्रिय नहीं हैं,पूछने पर इस बाबत वे बताते हैं कि “उनके पास कोई भी मोटर वाहन नहीं है उन्हें इसकी कभी आवश्यकता ही नहीं मेहसूस हुई इसलिए उन्होंने कभी इसे हासिल करने का भी प्रयास नहीं किया, पिछले दिनों उन्हे लकवा भी मार गया था जिसके चलते उन्हें बोलने में भी थोड़ी दिक्कत होती है फिर भी उन्होंने साईकिल चलाना नहीं छोड़ी वे फुरसत के वक्त बीड़ी भी बना लेते हैं जिससे उन्हें कुछ कमाई भी हो जाती है ।
हमारे देश में यूँ तो बहोत आर्दशवादी बातें होती हैं पर जब कोई सही में आर्दशवाद स्थापित करते हुए ईमानदारी से जीवन व्यतीत करता है तब हमारी व्यवस्था उसे हर कदम पर चुनौतियों से जूझने पर मजबूर कर देती है, कुछ ऐसा ही रामसिंह को भी झेलना पड़ा,वे बताते हैं अपनी सांसद की पेंशन पाने के लिए भी उन्हें काफी संर्घष करना पड़ा वे बताते हैं उनकी पेंशन काफी संर्घष के बाद किसी तरह 2005 में शुरू हो पाई,आज केंद्र में भी भाजपा की सरकार है और प्रदेश में देढ़ दसक तक भाजपा की सरकार रही,मगर इसके बावजूद भी पार्टी ने उन्हें कभी महात्व नहीं दिया उनसे कभी राय मशविरा भी नहीं किया गया,इस राजनैतिक गिरावट को लेकर रामसिंह काफी चिंतित दिखाई देते हैं इस उपेक्षा को लेकर सालभर पहले उनके धर्मांतरण की खबर भी मीडिया में आई थी । नीचे लिंक मौजूद है

अनुसूचित जाति से आने वाले रामसिंह अपने सांसद बनने की कहानी बयान करते हुए बताते हैं “तब मैं विश्वविद्यालय में पढ़ाई करता था और घर पर बीड़ी बनाकर अपना जीवकोपार्जन करता था,उसी दौरान जनसंघ ने मुझे सागर से सांसदीय सीट से उम्मीदवार बना दिया और मैं चुनाव जीत भी गया” रामसिंह की पत्नी राजरानी मौजूदा दौर के राजनेताओं की संपन्नता पर किये सवाल पर कहती हैं “सुविधाएं हों तो अच्छी बात है मगर मुझे और मेरे पति को सांसद की पेंशन पाने के लिए भी कई सालों तक संर्घष करना पड़ा अब इस पेंशन के सहारे ही जीवन चलता है” ।
रामसिंह के पड़ोसी गोविंद कहते हैं “रामसिंह अन्य नेताओं की तुलना में अलग हैं,वह ऐसे नेता नहीं हैं जो एक बार सांसद बने और खूब सुविधाएं हासिल कर लीं वह सज्जन सीधे और सरल स्वभाव के हैं कभी लगता ही नहीं कि वे ‌सांसद भी रहे हैं साईकिल पर चलते हैं और बीड़ी बनाकर गुजारा करते हैं”।
रामसिंह के कनिष्ठ छात्र रहे और सागर के मौजूदा सांसद लक्ष्मीनारायण यादव कहते हैं”जब रामसिंह को जनसंघ ने उम्मीदवार बनाया सब हैरान रह गये थे,वह चुनाव भी जीत गये मगर उन्होंने पूरा जीवन सादगी से बिताया, कुछ साल पहले एक बार जब सुना कि वह बीड़ी बनाकर गुजारा कर रहे हैं तो आश्चर्य हुआ” स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक विनोद आर्य बताते हैं”रामसिंह को देखकर उनके घर के हालात देखकर यह भरोसा नहीं होता वह कभी सांसद रहे हैं,किसी छुटभैये नेता का जीवन स्तर भी उनसे कई गुना बेहतर है, रामसिंह जी लोकतंत्र के सच्चे झंडाबरदार हैं ।

अजीम प्रेमजी: एक अजीम इंसान जिसका दिल प्रेम और इंसानियत से भरा है !

 


हर साल जब फोर्ब्स दुनियाभर के अरबपतियों की सूची जारी करता है तो भारतीय मीडिया में भारत में अरबपतियों की बढ़ती तायदाद और उनकी जायदाद खूब सुर्खियाँ बटोरती है। हमने बचपन में जिस अरबपति का नाम सबसे पहले सुना था वो शख्स थे विप्रो लिमिटेड के चेयरमैन जनाब अजीम हाशिम प्रेमजी। उसके बाद टाटा और बिरला अरबपतियों की पहचान बने और आज यही जगह अम्बानी को मिल चुकी है। अजीम प्रेमजी भले ही दौलत के मामले में देश के सबसे बड़े अमीर न हों, लेकिन समाजसेवा के लिये दरियादिली के मामले में उनके जैसा कोई और नज़र नहीं आता।
उनका जन्म 24 जुलाई, 1945 को तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेन्सी में हुआ था। उनके पिता जनाब मुहम्मद हाशिम प्रेमजी उस समय के जाने-माने कारोबारी थे जिन्हें पाकिस्तान बनने पर मुहम्मद अली जिन्ना ने खासतौर पर पाकिस्तान में बसने की दावत दी थी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। उनकी कम्पनी Western Indian Vegetables Products Ltd. शुरुआत में तेल और साबुन का उत्पादन किया करती थी। 1966 में अपने पिता के इंतक़ाल के बाद अजीम प्रेमजी (जो उस वक़्त अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे) हिन्दुस्तान वापस आ गये और कम्पनी की ज़िम्मेदारी सम्भाल ली।
अजीम प्रेमजी के कुशल नेतृत्व में कम्पनी ने काफी तरक्की की और कई सारे नये उत्पाद बनाने शुरू किये। लेकिन असली परिवर्तन अभी बाकी था। दरअसल अजीम प्रेमजी देश के शायद पहले कारोबारी थे जिन्होंने कम्प्यूटर क्रान्ति की संभावनाओं को सबसे पहले पहचाना। उनकी पारखी नज़र और दूरदर्शी सोच के नतीजे में आज की विप्रो कम्पनी वजूद में आयी जिसने सॉफ्टवेयर उद्योग में देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में अपनी एक अलग जगह बनायी। आज भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग की विश्व में जो पहचान है, उसको बनाने में जनाब अज़ीम प्रेमजी और उनकी कम्पनी विप्रो लिमिटेड की बड़ी अहम भूमिका रही है।
अज़ीम प्रेमजी का यह विश्वास है कि देश में सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए सशक्त शैक्षिक ढाँचा अत्यंत आवश्यक है। इसीलिए उन्होंने अजीम प्रेमजी फाउंडेशन नाम से एक संस्था बनाई है जो विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती है। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने साल 2013 में अपनी कम से कम आधी जायदाद को दान करने का एलान किया था। अभी दो दिन पहले ही उनके 55200 करोड़ रुपये के एक और महादान की खबर मीडिया में आई है।
उनकी इन सेवाओं के लिए कॉरपोरेट जगत और समाजसेवा से जुड़ी विभिन्न सरकारी और ग़ैरसरकारी संस्थाओं से अनगिनत पुरस्कार और सम्मान उन्हें मिल चुके हैं जिनमें सबसे अहम सन 2005 में भारत सरकार ्दवारा दिया जाने वाला देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण और 2011 में मिला देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण शामिल हैं। अप्रैल 2017 में इंडिया टुडे पत्रिका द्वारा प्रकाशित 50 सबसे शक्तिशाली भारतीयों की सूची में उनको 9वां स्थान मिला था।
अमीरों का दिन ब दिन और अमीर होते जाना और गरीबों के जीवनस्तर में कोई खास सुधार न हो पाना हालाँकि एक विश्वस्तरीय समस्या है लेकिन भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में यह समस्या बेहद भयावह हो चली है। आज हालत यह है कि इस समस्या से प्रभावी तरीके से निबटने के लिए सरकार के पास न तो पर्याप्त साधन हैं और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति। ऐसे में गैरसरकारी संस्थाओं और व्यक्तियों की भूमिका काफी अहम हो जाती है। अजीम प्रेमजी जैसे उद्योगपति न सिर्फ देश के आर्थिक विकास के लिए, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक विकास के लिए भी बेहद ज़रूरी हैं।

अनवर बरेलवी

आजादी के सिपाही

ऐसे थे वो..
कलकत्ता के निकट जगरगच्छा जेल में बंद उन 56 कैदियों को रोटी दी नही जातीं थी बल्कि कुत्ते बिल्लियों की तरह उनके सामने फैंकी जाती थी। एक दिन फिरंगी अधिकारी निरीक्षण पर आया तो वह उनकी बैरक तक भी पहुंचा। ‘औह…दीज आर दी ब्रेव इंडियन ?’ फिरंगी अधिकारी नें मुंह बनाते हुए पीछे खडे पिठ्ठुओं से पूछा। तो पीछे से आवाज आई ‘यस सर’। फिरंगी अफसर के दोनों हाथ बैरक के गेट में लगी लोहे की सलाखों पर थे। बैरक में बंद कैदी उसके ईरादों को भांप व समझ चुके थे। हूं..इंडियन ब्रेवज ? काना कैसा मिलते हैं ? फिरंगी का यह सवाल सुन कर खून खोल गया। उसने खडे होने का प्रयास किया , परन्तु साथी बडे अफसर ने हाथ दबा दिया। फिरंगी मानने वाला कहां था , उसने फिर कहा ‘एह..अमने पूचा , काना कैसा मिलते है ?’ उसका चेहरा लाल हो गया। खडा होने लगा तो उसी अफसर ने फिर हाथ दबाने का प्रयास किया , परन्तु इस बार उसने अपने अफसर के आदेश को भी मानने से इंकार कर दिया और खडा हो गया फिरंगी अधिकारी के सामने। फिरंगी अधिकारी का घमंड चूर चूर हो गया और उसका चेहरा , गुस्से में तमतमाने लगा। ‘बोलो..बोलो ..काना कैसा मिलते हैं ?’ फिरंगी अधिकारी ने जैसे ही यह सवाल सामने खडे उस नौजवान कैदी से किया तो उसने जोर से खखार कर फिरंगी अधिकारी के मुंह पे थूक दिया। दाड पीसते हुए कहा ‘काना ऐसे मिलते हैं।’
साथ मे कैद अधिकारी ने डांटते हुए जोर से कहा ‘ मंगल खान , यह ठीक नही किया। तुम कहीं भी मेवातीपन से बाज नही आते।’ मंगल खान , साहब की तरफ देख मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। बैरक में सभी कैदियों की चिंता स्वभाविक थी और बाहर ‘इंडियन ब्रेव’ की हरकत से हल्ला मच गया। तरह तरह की आवाजें आ रही थी ‘बाहर निकालो इन्हें’। ‘सबक सिखाओ इनको’ ‘इतना मारो कि भारत का नाम भी न ले पाएं’। उसके बाद जो हुआ उसे लिखने में मेरी उंगली कांप रही है। आंखें नम होने लगी हैं।

यह मंगल खान कोई ओर नही , हरियाणा के मेवात जिले के खंड नूंह के गांव खेडला में जन्मा भारत मां
का एक सच्चा सपूत था।
श्री मंगल खान मेवाती का जन्म 1-10-1898 को गांव के एक साधारण व गरीब से किसान नवाज खां के घर मे हुआ। 1924 मे वे ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए। बाद में बाबू सुभाष चन्द्र बोस के आह्वान पर ब्रिटिश सेना से बागी हो कर आजाद हिन्द फौज में चले गए। आजाद हिन्द फौज में , वे शाहनवाज बटालियन में सैकिंड लैफ्टिनेंट बने। जनरल शाह नवाज खान के नेतृत्व में उन्होनें रंगून , पोपाहिल , मेकटौला , नागा-साकी , इंडोग्राम , ब्रहमइंफाल जैसे असंख्य मोर्चों पर अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए। अदम्य साहस के बलबूते पर वे बाबू सुभाष चन्द्र बोस की निजि सीकरेट सर्विस के इंचार्ज बनाए गए।

लंबी लडाई के बाद बाबू जी के आदेश पर समूची आई० एन० ए० ने आत्म समर्पण कर दिया। 36 हजार की फौज में से 56 फौजियों की शनाख्त कर छांट लिया गया , जिन्हें कलकत्ता के निकट जगरगच्छा जैल में डाल दिया गया। जगरगच्छा जैल की यातनाओं के बाद फिर छटनी की गई तो 16 जांबाजों को दिल्ली लाकर , लाल किला में कैद कर दिया गया। जिनमें मुख्य तौर पर जनरल सहगल , जनरल शाहनवाज खान , कर्नल ढिल्लों , सैकिंड लेफ्टिनेंट मंगल खान आदि शामिल थे। इन 16 सपूतों पर फिरंगियों ने विभिन्न धाराओं मे मुकदमें दर्ज किए। जघन्य अपराधों में कथित रूप से लिप्त इन खूंखार ‘अपराधियों’ के केसों की सुनवाई के लिए लाल किला में ही ग्यारह जजों की बैंच वाली अदालत लगाई गई। लगभग तीन साल चले मुकदमों में विभिन्न सजाएं सुनाई गईं। अपीलें हुईं।
अंत में पंडित जवाहर लाल नेहरू नें ‘लाल किला ट्रायल’ में उक्त कथित अभियुक्तों की पैरवी की और ये वतन के सिपाही , भारत मां की स्वतंत्रता के साथ आजाद हो गए।
अपनी बकिया जिंदगी उसी खुद्दारी और सादगी से जीते हुए 19 सितंबर 1990 को इस दुनिया ए फानी से कूच कर गए।

लेखक
ऐडवोकेट नूरूद्दीन नूर पुत्र हैं इस महान स्वतंत्रता सेनानी स्व० चौधरी मंगल खान मेवाती के ।