पाँच साल पहले सोशल मीडिया पर लिखा था पोस्ट, पुलिस ने लगाया देशद्रोह

प्रधानमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट लिखने के एक पाँच साल पुराने मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पोस्टकर्ता इंचौली निवासी “फहम अजीम सिद्दिकी” के खिलाफ आई टी एक्ट और देशद्रोह का मुकदमा कायम कर कोर्ट में हाजिर किया जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया ।

फहम ने अप्रेल 2014 में प्रधानमंत्री के खिलाफ आठ दस पोस्ट लगाए थे,जिसपर भाजपा के नेता की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने फेसबुक मुख्यालय कैलीफोर्निया से सूचना मांगी थी,जिसके आधार पर फहम के खिलाफ आई टी एक्ट और धारा 124A(देशद्रोह)लगाई गयी है।

23 साल कैद के बाद बेगुनाह साबित हुऐ अली भट्ट का भावनाओं के बाजार में स्वागत ।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वाईरल हो जहा हैं जिसमें एक व्यक्ति कब्र पर औंधे मुँह लेटा हुआ है,दो व्यक्ति जो हाथों में कैमरा लिए हुए हैं वे इसे प्रोफ़ेशनल अंदाज़ में शूट कर रहे है, वीडियो आगे बढ़ने पर नजर आता है एक व्यक्ति उस औंधे मुँह लेटे व्यक्ति को उठाने के लिए आगे आता है,तभी वहीं मौजूदा अन्य व्यक्ति जो कैमरे की जद मे आने से बचते हुए उसे उठाने की कोशिश करने वाले व्यक्ति को ऐसा करने से मना करता नजर आता है ।

ये कब्र पर लेटा व्यक्ति मुहम्मद अली भट्ट है,22 मई सन 1996 को एक बस जो बीकानेर से आगरा जा रही थी,समलेकी नामक स्थान पर उस बस मे विस्फोट होता है और 14 लोग मारे जाते है और 37 घायल हो जाते हैं,उस घटना के कई आरोपियों में मुहम्मद अली भट्ट भी एक आरोपी था,जिन्दगी के अहम 23 साल जेल में गुज़ारने के बाद मुहम्मद अली भट्ट अदालत से निर्दोष साबित हुआ है,हमेशा की तरह सवाल फिर वही है कि उसके इन 23 सालों का हिसाब कौन देगा जो उसने बिना किसी गुनाह के जेल में गुज़ारे हैं,कांग्रेस की हुकूमत के वक़्त के दो ख़ौफ़नाक काग़ज़ी संगठन सिमी और इंडियन मुजाहिदीन “मुसलमानों औक़ात मे रहो” मुहीम को सलीक़े से अंजाम देते रहे,आजकल ये दोनो संगठन विलुप्त है,क्योंकि वर्तमान सरकार को ढक छुपकर कुछ भी करने की ज़रूरत नही है, आजकल तो फ़ैसला ऑन द स्पॉट किया जा रहा है,दोषी होने के लिये कोई आपत्तिजनक साहित्य बम बंदूक नहीं डेढ़ दो किलो गोश्त ही काफ़ी होता है ।

बात शुरू हुई थी कब्र पर औंधे मुँह लेटे मुहम्मद अली भट्ट से,मुहम्मद अली भट्ट जिस कब्र पर लेटा है वो उसके वालिद की क़ब्र है । 22 साल का वक़्त बहुत होता है,इस दौरान उसे पैरोल पर भी बाहर नही आने दिया गया क्योंकी वो एक ख़ूँख़ार आतंकवादी होने का आरोपी था । जेल से रिहा होने के बाद जब वो बाप को पुरसा देने क़ब्रिस्तान पहुँचा तो भावनाओं का ज्वार बर्दाश्त नही कर पाया और बाप की क़ब्र से लिपट गया,फिर वही हुआ जो ऊपर लिखा है ।

भावनाओं के व्यापार में मुनाफा बहुत और मेहनत कम है, इन्हीं भावनाओं के कई बड़े खिलाड़ी इस वक़्त तख़्तनशी है । वैसे इस खेल के छोटे मोटे खिलाड़ी हर जगह है । एक व्यक्ति जो 22 साल बाद अपनी बेगुनाही साबित कर जेल बाहर आता है । 22 साल पहले उसका बाप ज़िंदा था आज वो मिट्टी के नीचे दबा हुआ है । उसकी कैफ़ियत दूर बैठे हम आप महसूस कर सकते हैं। लेकिन दोनो प्रोफ़ेशनल कैमरा पर्सन को देखिए,उनके लिये मुहम्मद अली भट्ट भावनाओ के बाज़ार का वो कच्चा माल है जिसे नमक मिर्च लगाकर बाज़ार में बेचा जायेगा। ऐसा ही कुछ दिन पहले बाज़ार मे अभिनंदन था। ख़ैर वो बड़ा खेल था। इस छोटे खेल में भी कमज़ोर दिल वालों का तो कलेजा फट ही जायेगा,आवेश में मुट्ठियाँ तनेंगी,हुंकार उठेगी,और फिर सब शांत हो जायेगा हमेशा की तरह। लेकिन इसी सबके बीच किसी का मिशन पूरा होगा,कोई यूट्यूब चैनल हिट होगा,और फिर कहीं अगले शिकार की तलाश होगी। गिद्ध जो अब लुप्तप्राय है, इस पक्षी की ख़ासियत थी कि मरते जानवर के पास बैठ कर उसकी जान निकलने का इंतज़ार करता था। जान निकले की वो टूट पड़े। वो कालजयी फ़ोटो याद कीजिये जिसमें भूख से मरते बच्चे के पास गिद्ध बैठा है. उस फ़ोटोग्राफ़र मे इंसानियत ज़िंदा थी,वो इस मंज़र का सदमा बर्दाश्त नही कर पाया और उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। लेकिन आज ऐसा कहाँ होता है। इंसान के सदमे और इमोशन का बाज़ार बनाया जा चुका है। बैकग्राउंड में मातमी धुन डाल कर देखने वाले की आँख से आँसू निकाल अपनी जेबें जो भरनी होती हैं ।

दुनिया भर में इमोशन बहुत बड़ा बाज़ार है इसमें अनंत संभावनाएं हैं। पूँजीवाद अपने बाज़ार के लिये युद्ध करवाता है। जिसमे देश शहर तबाहो बर्बाद होते हैं। फिर बाज़ार वहाँ पहुँचता है। एनजीओ को पैसा देता है। एनजीओ आँसू पोंछते हैं। मातमी बैकग्राउंड म्यूज़िक के साथ डाक्यूमेंट्री बनती है। उस डाक्यूमेंट्री को बड़े बड़े ईनाम मिलते हैं,और फिर ये बाज़ार फलता फूलता रहता है।

हम सब इसी बाज़ार के ग्राहक हैं और मुहम्मद अली भट्ट जैसे लोग सामान हैं। जिसे कैसे हमारे सामने पेश करना है कि हम सीना पीटते हुए ख़रीदने दौड़े ये बाज़ार के व्यापारी तय करते है। कभी एक सन लाइट साबुन से नहाना धोना (कपड़ा) सब होता था. आज शरीर के हर हिस्से के लिए अलग साबुन,शैम्पू है। वैसे ही इमोशनल वाला धंधा है। कभी अभिनंदन है तो कभी मुहम्मद अली भट्ट है।

लेखक – इकबाल अहमद

मुख़्तार अंसारी हुए बरी,मंदिरों में पूजा अर्चना कर भगवान को धन्यवाद दे रहा हिंदू वर्ग

मुख्तार अंसारी के बरी होने पर हिंदू भाईयों ने मंदिरों में जाकर की पूजा अर्चना, बाँटी मिठाईयां ।


कल मऊ के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी और सांसद अफजाल अंसारी जी के सीबीआई कोर्ट से बरी होने के बाद आज उनके गृहजनपद गाजीपुर के यूसुफपुर मोहम्मदाबाद के शुमेश्वर महादेव मंदिर स्थान महदेवा, हनुमान मंदिर शहनिन्दा में सभासद राकेश यादव और पप्पू यादव ने अपने साथियो के साथ इन मन्दिरों में जाकर पूजा अर्चना की तथा प्रसाद बाँटकर खुशी का इजहार किया ।

जमानियाँ के में दरौली के हनुमान मंदिर मे जाकर पुजारी विजेंद्र पांडेय के हाथों हवन यज्ञ किया गया तथा इस न्याय की जीत के लिये बजरंग बली सहित सभी देवी देवताओं की वन्दना की गयी । अनिल यादव ने कहा की ये असत्य पर सत्य की जीत है पिछले 14सालों से बेकसूर अंसारी परिवार को एक साजिश के तहत फंसाकर जेलों मे बंद किया गया है लेकिन हमें अपने न्याय पालिका और भगवान पर पूरा भरोसा था कि गरीबों के मसीहा को न्याय मिलेगा हम सबने भगवान जी से मन्नत माँगी थी जो आज पूरी हुई है इसलिए हम सभी भगवान बजरंग बली सहित सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद लेने आये और प्रार्थना करते है कि बाकी मुकदमों मे भी बरी होकर मुख्तार अंसारी जल्द ही हम लोगो के बीच मे आये ।

इस मौके पर राकेश यादव, पप्पू यादव, बृजेश यादव, दीना यादव, सौरभ यादव आदि ने मिठाई खिलाकर खुशी का इजहार किया

बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी को स्पेशल कोर्ट ने किया बाइज्जत बरी ।

बीजेपी MLA कृष्णनंदन राय के हत्या के आरोप से आज CBI स्पेशल कोर्ट ने मुख्य आरोपी मुख्तार अंसारी समेत सभी पाँचो आरोपीयों को आरोप मुक्त कर दिया ।

गौर तलब है बसपा विधायक मुख्तार अंसारी समेत इस मामले में पांच लोगों को आरोपी बनाया गया था जिसमें से एक आरोपी मुन्ना बजरंगी की जेल में हत्या कर दी गयी थी ।

पूर्व IPS संजीव भट्ट को गुजरात कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद की सजा!

गुजरात: जामनगर कोर्ट ने पूर्व IPS संजीव भट्ट और उनके सहयोगी को दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई ।

1990 में आयोजित भारत बंद के दौरान जामनगर में हिंसा हुई थी,तब संजीव भट्ट ही जामनगर के ASP थे,इस दौरान पुलिस ने 133 लोगों को हिरासत में लिया था,जिनमें 25 लोग घायल हुए थे और आठ लोगों को अस्पताल भर्ती कराया गया था,इस हिरासत में रहने के दौरान एक आरोपी प्रभुदास माधव जी वैश्वानी की मौत हो गयी थी ।

तब इस मामले में संजीव भट्ट और उनके सहयोगी पर मारपीट का आरोप लगा था और उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया था, लेकिन तब की गुजरात सरकार ने मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी थी,उसके बाद 2011 में नरेंद्र मोदी सरकार ने संजीव भट्ट के खिलाफ ट्रायल की अनुमति दे दी,बीते बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने संजीव भट्ट की अपील को खारिज कर सुनवाई करने से इंकार कर दिया ।

अपनी गिरफ्तारी के दौरान इस पूर्व IPS ने कहा था कि नरेंद्र मोदी सरकार बदले की भावना से उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है क्योंकि वे सरकार की तानाशाही के खिलाफ  खासकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार लिखते रहे हैं आवाज उठाते रहे हैं ।

इस दौरान भट्ट की तरफ से गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, गुजरात हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमे के दौरान कुछ अतिरिक्त गवाहों को गवाही के लिए समन देने के उनके अनुरोध से इंकार कर दिया था, गुजरात सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि निचली अदालत ने 1990 के उनकी हिरासत में मौत के मामले पर पहले ही 20 June के लिए फैसला सुरक्षित कर रखा है ।

जस्टिस बनर्जी और जस्टिस रस्तोगी की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने गुजरात सरकार व अभियोजन पक्ष की दलील को माना कि सभी गवाहों को पेश किया जा चुका है और उसके बाद फैसले को सुरक्षित रखा गया है,अब दोबारा मुकदमें पर सुनवाई करना सजा के मामले में देर करने की रणनीति है ।

संजीव भट्ट को 2011 में बिना मंजूरी के गैर हाजिर रहने व आवंटित सरकारी वाहन के दुरूपयोग को लेकर निलंबित कर दिया गया था

संसद में गूंजते इन पूंजीवादी धार्मिक नारों के बीच आपका हित यानि जनहित कहाँ है?

कमाल का मुल्क है हमारा और गजब के नुमाइंदे चुने हैं हमने,और न्यूज एंकरों की महिमा अपरम्पार है,कल जो कुछ हुआ संसद में वो तो हैरतअंगेज था ही पर जो नंगा नाच कल न्यूज स्टूडियोज में हुआ वो भी कम ऐतिहासिक नहीं है ।

अभी एक मित्र की पोस्ट पढ़ी किस तरह एक खेल (क्रिकेट) को खेल भावना से दूर कर जंग का मैदान बना दिया जाता है जब भी भारत और पाकिस्तान आमने सामने होते हैं,और ऐसा सिर्फ एक हमारे ही महान मुल्क में नहीं होता हमारा पड़ोसी मुल्क भी हमसे चार हाथ आगे निकल जाता है ।

अभी हाल ही में एक विज्ञापन में भारत-पाकिस्तान के मैच से पहले भारत को पाकिस्तान का बाप बताया गया था जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में भी एक विज्ञापन लाया गया, जिसमें विंग कमांडर अभिनंदन के जैसे दिखने वाले व्यक्ति के जरिए भारत को निशाना बनाया गया ।

अब आप सोच रहे होंगे संसद और क्रिकेट मैच दो अलग अलग विषय की बात यहां एक साथ क्यों की जा रही है, दरअसल हम ज्यादा समझदार लोग हैं इसलिए लोड ज्यादा लेने की आदत पड़ चुकी है,खैर मेन मुद्दे पर आते हैं आखिर जरूरत क्यों आन पड़ी दोनो विषय की बात एक साथ करने की ।

दरअसल दोनों ही विषय बाजार (मार्केटिंग) से जुड़े हैं जिसमें ब्रांड वैल्यू ही हमेशा मायने रखती है आम लोग या तो इतने मासूम हैं या फिर इतने शातिर कि वे हमेशा वो रिएक्शन देते हैं या देने पर मजबूर होते हैं जो बाजार चाहता है,भारत और पाकिस्तान में दो अलग अलग ऐड बनाने वाली ऐड ऐजेंसी भी अगर एक ही निकल आये तो कतई हैरानी की बात नहीं होगी, देखिए व्यापार करने के दो ही तरीके होते हैं जितना भी अब तक सुना,पढ़ा,और जाना है जिसमें हमेशा ही दो थ्योरी लगायीं जाती हैं,या तो आप जरूरत के अनुसार बाजार सजायें या बाजार सजा को कर जरूरत पैदा करें ।

अब इसे कहते क्या हैं ये तो मैं नहीं बता सकता पर ये दोनों ही थ्योरी लॉजिकली करेक्ट और प्रभावी हैं,मिसाल के तौर पर कुछ समय पहले एक फूड ऐप इंस्टॉल की थी जिसपर शुरूआती 15 दिनों तक बंपर ऑफर मिले यहां तक कि मैने 18₹ में घर बैठे भरपेट खाया,अब इन 15 दिनों का असर ये हुआ कि मैं जो बाहर सिर्फ मजबूरी में खाने जाता था मजे में ऑर्डर करने लगा,चार माले नीचे उतर कर फिर पाँच सौ मीटर चलकर कुछ खरीद कर लाने की जगह बैठे बैठे ऑर्डर करने लगा ।

भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बहोत अच्छे कभी नहीं रहे पर दोनो के बीच व्यापार पूर्ण रूप से कभी बंद नहीं हुआ भले हम आपस में तीन युद्ध लड़ लिए हों,या सालों हमारे प्रधानमंत्रियों में बातचीत नहीं रही हो,और आज भी यही हो रहा है जानते हैं क्यों? क्योंकि बाजार लोक,समाज,देश और धर्म में यकीन नहीं रखता वहाँ इनपुट और आउटपुट ही सारे फैसले तय करता है ।

अभी इसका एक और ताजा उदाहरण Honor Vs Google के बीच छिड़ी जंग को देखकर आप समझ सकते हैं कैसे दो कंपनियों की जंग में देश दखल दे रहे हैं।

मौजूदा समय में पूरी कोशिश की जा रही है भारतीय राजनीति को दो हिस्सों में बाँटने की जहां दलों और लोगों की पहचान धार्मिक हो जाये और फिर जो संविधान के आर्टिकल 26 में स्टेट के सैक्यूलर होने की जो मजबूरी है वो खत्म हो सके,2014 के बाद से जबसे एक कथित हिंदुत्ववादी दल सत्ता में आया है तब से इसकी गति और तेज हुई है जो मीडिया जैसे अपने हर टूल का इस्तेमाल कर इसमें लगातार तेजी लाने के प्रयास में लगा हुआ है, जिसमें रिएक्शन पॉलिटिक्स करने वाले सभी दल और नेता मैन स्ट्रीम मीडिया में अक्सर सुर्खियां बटोरते पाये जाते हैं ।

सीमा और क्रिकेट के मैदान पर जो हाल भारतVsपाकिस्तान का है वही हाल देश के भीतर हिंदूVsमुसलमान का किया जा रहा है,अगर आप सोचते इससे किसी जात,धर्म,या पंथ का फायदा होगा ये उनके हित में होगा तो आप गलत हैं, क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ बाजार सियासत और राजनेताओं के हित में है ।

बिहार से लेकर बंगाल तक हाहकार मचा हुआ है देश मेडिकल इमरजेंसी और वॉटर इमरजेंसी जैसे हालातों से जूझ रहा है,पर हमारी संसद में धार्मिक नारे गूंज रहे,कभी सोचा है कि संसद में गूंजते इन पूंजीवादी धार्मिक नारों के बीच आपका हित यानि जनहित कहाँ है?

सैय्यद असलम अहमद

जब संसद में लगने लगे जय श्री राम और अल्लाहु अकबर के नारे !

हैदराबाद से सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के शपथग्रहण के दौरान अजीब नजारा देखने को मिला,जब भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों के सांसदों ने असदउद्दीन ओवैसी के शपथग्रहण के दौरान जय श्री राम,और वंदेमातरम् के नारे लगाना शुरू कर दिए,इससे पहले तृणमूल कांग्रेस सांसदों के शपथग्रहण के दौरान यही नजारा देखने को मिला था ।

संसद सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को जब हैदराबाद सांसद शपथ ले रहे थे,तब भारतीय जनता पार्टी,और NDA के सहयोगी दलों के सांसदों ने जय श्री राम और वंदेमातरम् के नारे लगाना शुरू कर दिए, जिसके जबाब में असदुद्दीन ओवैसी ने भी दोनों हाथों को उठाकर और जोर शोर से नारे लगाने का इशारा किया,अपनी शपथ पूरी होने के बाद आखिर में उन्होंने जय हिन्द,जय भीम जय मीम,और अल्लाहु अकबर के नारे लगाए ।

असदुद्दीन ओवैसी ने भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक दलों पर निशाना साधते हुए कहा प्रतिक्रिया में कहा “कमसे कम मुझे देखकर ही सही इन्हे राम तो याद आये” आगे उन्होंने कहा कि काश उन्हें बिहार में हो रहीं बच्चों की मौतें भी याद आ जातीं, साथ ही उन्होंने कहा उम्मीद है भाजपा वालों को संविधान भी याद रहेगा और मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत भी याद रहेगी ।

सलीका जरूरी है विरोध के लिए भी…..

मेरी चाय की होटल थी और जो काउन्टर देखता था उसका नाम जयेश था…

मेरा अच्छा दोस्त था और बड़ा भाई मानता था मुझको!

वो मुसलमानों को मानता भी बहुत था,खुद उसके मोहल्ले में एक दरगाह थी जहां वो आते जाते रहता था!
कभी कभार वो हिन्दू मुस्लिम मुद्दे के कुछ ऐसे सवाल पूछ लेता जिससे मैं चौकन्ना रह जाता था…
पर मैं हमेशा उसको सही ढंग से समझा देता था और वो सब भूल कर मस्त काम मे लगा रहता।एक दिन वो बाइक चला रहा था और मैं उसके पिछे बैठा था…इत्तेफ़ाक़ से उसका मोबाइल मेरे हाथ मे था और मैं उसी से टाइमपास कर रहा था!जब मैंने उसका wtsp खोला तो मैं पूरी तरह चौंक गया…उसके wtsp में 10/12 तरह के अलग अलग हिंदुत्ववादी या बीजेपी it सेल टाइप के कुछ ग्रुप थे…आधे घण्टे का टाइम था तो मैंने सब ग्रुप चेक किये!मैं ये देखकर चौंक गया कि हम में से कहीं मुसलमानों के ऐसे स्क्रीन शॉट आये हुए थे जो भक्तों का,मोदी का,देवी देवताओं का मजाक उड़ाते थे और ये उनके दिलों में नफरत भरने के लिए काफी था!

इतनी ज्यादा नफरत लोगो के दिमाग मे इन ग्रुपो से भरी जा रही जिनका अंदाज़ा कोई नही लगा सकता!

जब हम दुकान पर पहुंचे तो मैंने उसको साइड में बैठाया और कहा कि ये सब क्या है?
किसने बताया तुझे ये सब?

वो बोला कि “सेठ!मुझे खुद को नही पता कि मैं कब एड होता,रोज़ रोज़ नए ग्रुपो में एड हो रहा…जिनको मैं जानता तक नही वो लोग मुझे ऐसे ग्रुपो में एड कर रहे!”

मैंने उसको समझाया कि कुछ भी मन मे बात हो तो मुझसे बात कर लिया कर…बस अंदर नफरत मत भरना किसी के लिए!

उसके बाद वो हर कभी मुझसे कुछ न कुछ सवाल पूछता और मैं आराम से जवाब दे देता…एक वक्त पर ऐसा हाल था कि मैं सोया रहता तो जबर्दस्ती मुझे उठाकर नमाज़ पढ़ने भेज देता कि जाकर नमाज़ पढ़ो,तो दुकान में बरकत होगी!एक ही प्लेट में खाना और एक ही ग्लास में पानी पीते थे हम लोग उस टाइम!

फिर मुझे वो दुकान छोड़नी पड़ी,मैं अपने रस्ते पर निकल गया और जयेश अपने रस्ते पर!अब कभी जब मैं उसका wtsp स्टेटस देखता तो उसमें हमेशा मुझे हल्की हल्की मुसलमानों के लिए नफरत नज़र आने लगी!

ऐसे करोड़ो जयेश हैं जो न चाहते हुए भी इस दलदल में फंस रहे और उसकी मुख्य वजह कुछ हमारी हरकतें भी हैं!रोडसाइड दूर की बात सोशियल मीडिया की ही हरकतें देख लें!

कुछ पत्रकार सेलेब्रिटी लोग मोदी विरोध बहुत सहजता से कर लेते,उनसे इंस्पायर होकर कुछ लोग जिनका दिमागी और समझने का स्तर कम होता वो मज़ाक मस्ती तंज करके अपना विरोध करते और खुद को बड़ा लेखक समझने लगते और फिर उनसे इंस्पायर वो लड़के हो जाते जिनको बोलने चालने का ढंग ही नही होता और वो विरोध में इतने पगला जाते कि धर्म मजहब के लिए उल्टा पुलटा लिखना शुरू कर देते…edit pic बनाते,गालियां देते और नफरतों का बढ़ावा देकर it cell वालो को नफरत फैलाने का सामान अवेलेबल कराते!

पत्रकार सेलीब्रिटी लोगो का कुछ नही कर सकते वो अपना विरोध सही स्तर से कर रहे पर उनसे नीचे वाले जो हम हैं,जो रात दिन मस्ती- मज़ाक,मज़े लेते,तंज करते,इस चीज़ को हम मिलकर खत्म कर सकते ताकि हमसे नीचे वाला जो तबका है वो हमसे सही राह सीखे ना कि हमसे नफरत करने वाली राह चुने!

मेरे घर मे बच्चे हैं और आपके घरो में भी प्यारे प्यारे बच्चे होंगे जो हमारे लिए सबसे अजीज हैं…क्या आप सच मे उन्हें इस भयावह और शैतानी माहौल में पलते बढ़ते देखना चाहते?

अपने लिए नही,खुदा के लिए नही,किसी और के लिए नही बस अपने उन बच्चों की खातिर खुद को कुछ वक्त के लिए रोक लीजिए!
हमारा घिरता विरोध कुछ अच्छा नही करने वाला पर हां हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बहुत ही भयावह,घृणित माहौल जरूर तैयार कर रहा!

अब आप सोचिए आपको करना क्या?

 

रिजवान मस्तान

सोचना हमें है डर कर शांत बैठ जाना है, ख़ेमा बदल लेना है, या फिर डरते हुए भी डर से आज़ादी के लिए लड़ना है ………

कई राज्यों में विधानसभा चुनाव नज़दीक है. सत्ता पक्ष सरकार विधानसभा चुनाव कि तैयारियों में लग चुकी है के इस बार बेईमानी इस प्रकार से करनी है के बोलने लिखने वालों के नज़र में भी न आए. विपक्ष के रानीतिक दल केंद्र में हार का मंथन कर रहें होंगे या नई रणनीति तैयार कर रहें होंगे के विधानसभा चुनाव में क्या एजेंडा होने चाहिए.

क्या ऐसा हो सकता है के विपक्ष आने वाले चुनाव को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी कि तरह ही मतदाताओं के यहां राष्ट्रवाद धर्म जाति ही लेकर पहुंच जाए? ऐसा भी हो सकता है विपक्ष को शिक्षा रोज़गार विकास महिलाओं अल्पसंख्यक दलित आदिवासी कि सुरक्षा के मुद्दे साधारण मुद्दे लगने लगें हो?

केंद्र के चुनाव परिणाम के बाद गैर-भाजपाई मीडिया के कुछ पत्रकारों ने ईवीएम में घपला बताया है चुनाव आयोग से सवाल किए है लेकिन चुनाव आयोग ने जवाब नहीं दिए. जवाब देने वाले न्यायधीश लोया को या मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर लगे आरोप को नज़र में रखते होंगे. मैं न्यायाधीश लोया कि मृत्यु या हत्या का जिम्मेदार अभी किसी को नहीं ठहरा रहा हु मेरी अभी मरने कि इच्छा नहीं है क्योंकि मेने मौत का हक़ अभी तक अदा नहीं किया है अभी बहुत कुछ करना चाहता हु उसके लिए जिंदा रहना एक अहम शर्त है. ध्यान रहें मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई से फिलहाल मेरी कोई हमदर्दी नहीं है.

हां तो मैं कहाँ था होने वाले विधानसभा चुनाव पर अगर भारतीय जनता पार्टी भारत के राज्यों में भी अपनी सरकार बना लेती है तो राज्यसभा भी इनकी है. हम इस पर बहस कर सकते है के राष्ट्रपति सत्ता पक्ष सरकार का होता है या नहीं, मेने पढ़ा है पढ़ाया गया है राष्ट्रपति आज़ाद होता है.

लोकसभा राज्यसभा और जहां नहीं होनी चाहिए वहां भी सब जगह एक ही पक्ष है. संविधान पर हमले कि रफ्तार तो कभी हल्की नहीं थी लेकिन रफ्तार को हल्की करने के लिए कई दीवारें बीच मे मौजूद थी. अब ये दीवारें कमज़ोर नज़र आने लगी है कुछ गिर गयीं है कुछ सिर्फ ज़ाहिरी तोर पर खड़ी है.

अगर मैं कहूँ के साल ढेड़ साल में संविधान पर भारी संकट आने वाला है बड़े लेवल पर फेर बदलाव होंगे. जो अधिकार संविधान नागरिक को देता है वो अधिकार आने वाले वक़्त में नागिरक को नहीं मिलेंगे. अब कैसे अधिकार कुछ भी हो सकते है बोलने लिखने के सम्मान के खाने पीने के कुछ भी या ये भी हो सकता है के किसी भी अधिकार को इस्तेमाल करने के लिए एनओसी लेना पड़े जो सरकारी दफ्तरों, न्यायालय से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के नज़दीकी कार्यालयों से. पढ़ते हुए डर लग रहा होगा जानता हूं लगेगा डर एक स्वाभाविक प्रक्रिया है मुझे भी लगता है ऐसा कुछ भी लिखते हुए पढ़ते हुए. अब सोचना हमें है डर कर शांत बेठ जाना है गुलाम बनने के लिए ख़ेमा बदल लेना है या डरते हुए डर से आज़ादी के लिए कुछ करना है लड़ना है इखट्टा होना है नई रणनीति तैयार करनी है.

 

मोहम्मद अबुज़र चौधरी

खुली आंखों पर चढ़ी परत सा है आतंकवाद ।

आतंकवाद को अगर पूरी तौर पर ताकतवर मुल्कों की देन कहा जाये तो अतिश्योक्ती नहीं होगी ! जिस आतंकवाद को एक धर्म विषेश के साथ जोड़ा जाता है ये उस नीति का एक हिस्सा भर है जो पॉवर(तेल) से जुड़ा है ।

विश्वशांति की बात करने वाले ही घातक हथियारों के सौदागर हमेशा से रहे हैं इतिहास इस बात का गवाह है ! और ये भी एक सच है कि जब जब शांति सुरक्षा के नाम पर ताकतवर बनने की होड़ शुरू हुई है हमेशा सिर्फ रक्तपात हुआ है ।

आदिम युग से लेकर आधुनिक युग तक इंसान शक्ति का पुजारी रहा है और शक्ति की जरूरत तब ज्यादा मेहसूस होती है जब इंसान डरा हुआ हो ! इसी बात का फायदा उठाने के लिए कथित दुनिया के चौधरी और इसके अभिन्न मित्र देशों ने मिलजुल कर आतंकवाद के खेल की शुरूआत की हालांकि इसके नाम पर किसी ही एक देश से ज्यादा कमाई नहीं हो सकती थी इस सच को मद्देनजर रख कर स्वयम् पोषित आकंवादियों को जगह जगह पोंहचाया गया ।

हाँ ये वे भूल गये थे जिस विनाशकारी चीज का निर्माण हम फायदे के लिए करते हैं कभी कभी हमें उसका नुकसान भी उठाना पड़ता है नतीजतन ट्विन टावर जैसी घटनायें,अब ये कितनी हुयीं ये हम और आप भी अच्छी तरह जानते हैं,और ये जब भी हुयी हैं ताकतवर मुल्कों को वक्ती नुकसान निकालकर हमेशा लाभकारी ही साबित हुआ है, इस जोड़ तोड़ के सहारे ही इन मुल्कों की चौधराहट आज भी कायम है ।

किसी भी मुल्क में शांति की स्थापना के नाम पर तबाही मचाकर उसके अहम ठिकानो पर कब्जा करने के लिए पहले उस मुल्क में आशांती होना जरूरी है, मिसाल के तौर पर “रासायनिक हथियारों” के नाम पर इराक के क्या हालात बना दिये गये ये भी किसी से छिपा नहीं है और कितने रासायनिक हथियार मिले हैं इसका आज तक किसी को पता नहीं आखिर क्यों?।

देखा जाये तो अब तक आतंकवाद शुद्ध रूप से एक पोलिटिकल टूल ही साबित होता है, हालांकि कभी कभी अपवाद स्वरूप कुछ घटनाओं का होना हथियारों के सौदागरों ोो  के लिए फायदेमंद ही साबित होता है, इससे धर्म विशेष को टारगेट करने में मदद ही करता है ! इराक से लेकर सीरिया तक सिर्फ और सिर्फ शुद्ध नफा कमाया जा रहा है इंसानी लाशों के ढेर लगाकर और इसका जिम्मेदार कोई धर्म  नहीं पर हाँ इस बात का खास ख्याल रख कोशिश की जाती है कि के जिम्मेदार एक धर्म विशेष ही नजर आये जिससे नफरत बढ़े और व्यपार भी ।