सलीका जरूरी है विरोध के लिए भी…..

मेरी चाय की होटल थी और जो काउन्टर देखता था उसका नाम जयेश था…

मेरा अच्छा दोस्त था और बड़ा भाई मानता था मुझको!

वो मुसलमानों को मानता भी बहुत था,खुद उसके मोहल्ले में एक दरगाह थी जहां वो आते जाते रहता था!
कभी कभार वो हिन्दू मुस्लिम मुद्दे के कुछ ऐसे सवाल पूछ लेता जिससे मैं चौकन्ना रह जाता था…
पर मैं हमेशा उसको सही ढंग से समझा देता था और वो सब भूल कर मस्त काम मे लगा रहता।एक दिन वो बाइक चला रहा था और मैं उसके पिछे बैठा था…इत्तेफ़ाक़ से उसका मोबाइल मेरे हाथ मे था और मैं उसी से टाइमपास कर रहा था!जब मैंने उसका wtsp खोला तो मैं पूरी तरह चौंक गया…उसके wtsp में 10/12 तरह के अलग अलग हिंदुत्ववादी या बीजेपी it सेल टाइप के कुछ ग्रुप थे…आधे घण्टे का टाइम था तो मैंने सब ग्रुप चेक किये!मैं ये देखकर चौंक गया कि हम में से कहीं मुसलमानों के ऐसे स्क्रीन शॉट आये हुए थे जो भक्तों का,मोदी का,देवी देवताओं का मजाक उड़ाते थे और ये उनके दिलों में नफरत भरने के लिए काफी था!

इतनी ज्यादा नफरत लोगो के दिमाग मे इन ग्रुपो से भरी जा रही जिनका अंदाज़ा कोई नही लगा सकता!

जब हम दुकान पर पहुंचे तो मैंने उसको साइड में बैठाया और कहा कि ये सब क्या है?
किसने बताया तुझे ये सब?

वो बोला कि “सेठ!मुझे खुद को नही पता कि मैं कब एड होता,रोज़ रोज़ नए ग्रुपो में एड हो रहा…जिनको मैं जानता तक नही वो लोग मुझे ऐसे ग्रुपो में एड कर रहे!”

मैंने उसको समझाया कि कुछ भी मन मे बात हो तो मुझसे बात कर लिया कर…बस अंदर नफरत मत भरना किसी के लिए!

उसके बाद वो हर कभी मुझसे कुछ न कुछ सवाल पूछता और मैं आराम से जवाब दे देता…एक वक्त पर ऐसा हाल था कि मैं सोया रहता तो जबर्दस्ती मुझे उठाकर नमाज़ पढ़ने भेज देता कि जाकर नमाज़ पढ़ो,तो दुकान में बरकत होगी!एक ही प्लेट में खाना और एक ही ग्लास में पानी पीते थे हम लोग उस टाइम!

फिर मुझे वो दुकान छोड़नी पड़ी,मैं अपने रस्ते पर निकल गया और जयेश अपने रस्ते पर!अब कभी जब मैं उसका wtsp स्टेटस देखता तो उसमें हमेशा मुझे हल्की हल्की मुसलमानों के लिए नफरत नज़र आने लगी!

ऐसे करोड़ो जयेश हैं जो न चाहते हुए भी इस दलदल में फंस रहे और उसकी मुख्य वजह कुछ हमारी हरकतें भी हैं!रोडसाइड दूर की बात सोशियल मीडिया की ही हरकतें देख लें!

कुछ पत्रकार सेलेब्रिटी लोग मोदी विरोध बहुत सहजता से कर लेते,उनसे इंस्पायर होकर कुछ लोग जिनका दिमागी और समझने का स्तर कम होता वो मज़ाक मस्ती तंज करके अपना विरोध करते और खुद को बड़ा लेखक समझने लगते और फिर उनसे इंस्पायर वो लड़के हो जाते जिनको बोलने चालने का ढंग ही नही होता और वो विरोध में इतने पगला जाते कि धर्म मजहब के लिए उल्टा पुलटा लिखना शुरू कर देते…edit pic बनाते,गालियां देते और नफरतों का बढ़ावा देकर it cell वालो को नफरत फैलाने का सामान अवेलेबल कराते!

पत्रकार सेलीब्रिटी लोगो का कुछ नही कर सकते वो अपना विरोध सही स्तर से कर रहे पर उनसे नीचे वाले जो हम हैं,जो रात दिन मस्ती- मज़ाक,मज़े लेते,तंज करते,इस चीज़ को हम मिलकर खत्म कर सकते ताकि हमसे नीचे वाला जो तबका है वो हमसे सही राह सीखे ना कि हमसे नफरत करने वाली राह चुने!

मेरे घर मे बच्चे हैं और आपके घरो में भी प्यारे प्यारे बच्चे होंगे जो हमारे लिए सबसे अजीज हैं…क्या आप सच मे उन्हें इस भयावह और शैतानी माहौल में पलते बढ़ते देखना चाहते?

अपने लिए नही,खुदा के लिए नही,किसी और के लिए नही बस अपने उन बच्चों की खातिर खुद को कुछ वक्त के लिए रोक लीजिए!
हमारा घिरता विरोध कुछ अच्छा नही करने वाला पर हां हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बहुत ही भयावह,घृणित माहौल जरूर तैयार कर रहा!

अब आप सोचिए आपको करना क्या?

 

रिजवान मस्तान

सोचना हमें है डर कर शांत बैठ जाना है, ख़ेमा बदल लेना है, या फिर डरते हुए भी डर से आज़ादी के लिए लड़ना है ………

कई राज्यों में विधानसभा चुनाव नज़दीक है. सत्ता पक्ष सरकार विधानसभा चुनाव कि तैयारियों में लग चुकी है के इस बार बेईमानी इस प्रकार से करनी है के बोलने लिखने वालों के नज़र में भी न आए. विपक्ष के रानीतिक दल केंद्र में हार का मंथन कर रहें होंगे या नई रणनीति तैयार कर रहें होंगे के विधानसभा चुनाव में क्या एजेंडा होने चाहिए.

क्या ऐसा हो सकता है के विपक्ष आने वाले चुनाव को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी कि तरह ही मतदाताओं के यहां राष्ट्रवाद धर्म जाति ही लेकर पहुंच जाए? ऐसा भी हो सकता है विपक्ष को शिक्षा रोज़गार विकास महिलाओं अल्पसंख्यक दलित आदिवासी कि सुरक्षा के मुद्दे साधारण मुद्दे लगने लगें हो?

केंद्र के चुनाव परिणाम के बाद गैर-भाजपाई मीडिया के कुछ पत्रकारों ने ईवीएम में घपला बताया है चुनाव आयोग से सवाल किए है लेकिन चुनाव आयोग ने जवाब नहीं दिए. जवाब देने वाले न्यायधीश लोया को या मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर लगे आरोप को नज़र में रखते होंगे. मैं न्यायाधीश लोया कि मृत्यु या हत्या का जिम्मेदार अभी किसी को नहीं ठहरा रहा हु मेरी अभी मरने कि इच्छा नहीं है क्योंकि मेने मौत का हक़ अभी तक अदा नहीं किया है अभी बहुत कुछ करना चाहता हु उसके लिए जिंदा रहना एक अहम शर्त है. ध्यान रहें मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई से फिलहाल मेरी कोई हमदर्दी नहीं है.

हां तो मैं कहाँ था होने वाले विधानसभा चुनाव पर अगर भारतीय जनता पार्टी भारत के राज्यों में भी अपनी सरकार बना लेती है तो राज्यसभा भी इनकी है. हम इस पर बहस कर सकते है के राष्ट्रपति सत्ता पक्ष सरकार का होता है या नहीं, मेने पढ़ा है पढ़ाया गया है राष्ट्रपति आज़ाद होता है.

लोकसभा राज्यसभा और जहां नहीं होनी चाहिए वहां भी सब जगह एक ही पक्ष है. संविधान पर हमले कि रफ्तार तो कभी हल्की नहीं थी लेकिन रफ्तार को हल्की करने के लिए कई दीवारें बीच मे मौजूद थी. अब ये दीवारें कमज़ोर नज़र आने लगी है कुछ गिर गयीं है कुछ सिर्फ ज़ाहिरी तोर पर खड़ी है.

अगर मैं कहूँ के साल ढेड़ साल में संविधान पर भारी संकट आने वाला है बड़े लेवल पर फेर बदलाव होंगे. जो अधिकार संविधान नागरिक को देता है वो अधिकार आने वाले वक़्त में नागिरक को नहीं मिलेंगे. अब कैसे अधिकार कुछ भी हो सकते है बोलने लिखने के सम्मान के खाने पीने के कुछ भी या ये भी हो सकता है के किसी भी अधिकार को इस्तेमाल करने के लिए एनओसी लेना पड़े जो सरकारी दफ्तरों, न्यायालय से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के नज़दीकी कार्यालयों से. पढ़ते हुए डर लग रहा होगा जानता हूं लगेगा डर एक स्वाभाविक प्रक्रिया है मुझे भी लगता है ऐसा कुछ भी लिखते हुए पढ़ते हुए. अब सोचना हमें है डर कर शांत बेठ जाना है गुलाम बनने के लिए ख़ेमा बदल लेना है या डरते हुए डर से आज़ादी के लिए कुछ करना है लड़ना है इखट्टा होना है नई रणनीति तैयार करनी है.

 

मोहम्मद अबुज़र चौधरी

वक़्त के साथ मुश्किल होता रास्ता

कन्हैया कुमार की मुश्किलें अब बढ़ती नजर आ रही हैं उनके लिए रास्ता मुश्किल होता जा रहा है,चुनाव पूर्व जहाँ कन्हैया को जो अपार जनसमर्थन हासिल था वो अब उनके साथियों और समर्थकों की गलतियों के चलते  दरकता नजर आ रहा है,अब तक जो भी लोग उनके समर्थन में प्रचार करने पोंहचे उनमें जिग्नेश,शेहला,जावेद अख्तर,फातिमा नफीस ही ज्यादा चर्चाओं में रहे हैं और इनमें भी अगर फातिमा नफीस को अलग कर दिया जाये तो बाकी के तीन नाम जाने अनजाने कन्हैया कुमार का फायदा कम नुक़सान ज्यादा करते नजर आये हैं ।

 

फिलहाल शायर जावेद अख्तर चर्चाओं में हैं अपनी विवादित टिप्पणी को लेकर ,लगता है जावेद अख्तर साहब बोलते वक्त भूल गये कि कन्हैया कुमार को सिर्फ शहर का वोट नहीं जिता सकता जीतने के लिए उन्हें गाँवों के वोटों की भी सख्त जरूरत होगी,व्यंग्य के रूप में कही गयी उनकी बात का जो ऊपरी अर्थ निकलता है उस से कन्हैया गिरराज सिंह के मुकाबले तनवीर हसन के विरोधी ज्यादा नजर आते हैं,बिना नाम लिए उन्होंने कहा “कन्हैया को वोट ना देने वाले लोगों को चाहिए वे तनवीर को वोट ना देकर गिरराज को वोट दें कमसे कम वो अहसान तो मानेंगे” तनवीर हसन 2014 के चुनाव  में रजद टिकट पर चुनाव लड़कर भी साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा वोट पाकर मजबूती से मोदी को सीधी चुनौती देते नजर आये थे,और ऐसा कुछ ही गिनी चुनी सीटों पर हुआ था जो ये साबित करता है कि तीन बार MLC रहे तनवीर हसन एक सेक्यूलर और जमीनी नेता हैं जनता पर उनकी पकड़ काफी मजबूत है पर जावेद अख्तर अपनी बातों से उन्हें सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो का नेता साबित करने की कोशिश कर गए।

शायर जावेद अख्तर

मौजूदा वक्त में भी तनवीर हसन बेगुसराय में सबसे मजबूत कैंडीडेट नजर आ रहे हैं क्योंकि पिछली बार जिस प्रतिद्वंद्वी भोला सिंह ने उन्हें हराया था उनके स्थान पर भारतीय जनता पार्टी ने अपने विवादास्पद नेता गिरिराज सिंह को उतारा है,जिन्हें हराना तनवीर हसन के लिए आसान होता अगर कन्हैया यहाँ से चुनाव ना लड़ रहे होते क्योंकि पिछली बार वे सिर्फ रजद के प्रत्याशी थे अब गठबंधन के हैं जिसमें बिहार की कई महत्वपूर्ण पार्टियां भी शामिल हैं ।

कन्हैया कुमार एक अच्छे और प्रभावी वाक्ता हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं पर जिस ढंग से उनके साथी अपने बयानों से उन्हें कमजोर करने का काम कर रहे हैं जो उन्हें सत्ता की दौड़ से बहार कर सकता है,गिरराज सिंह कट्टर और विवादास्पद होने के साथ साथ बेगुसराय के लिए बहारी नेता भी हैं कन्हैया कुमार शुरू से ही उनको और नरेंद्र मोदी को चुनौती देते नजर आ रहे थे जो कि उनकी पहचान भी रही है ,पर जावेद अख्तर ने एक विवादित टिप्पणी कर उनकी सारी मेहनत पर पानी फेरने का काम किया है,वहीं दूसरी ओर शेहला राशिद भी जावेद अख्तर की राह चलकर धर्म को टारगेट करने की रणनीति को आगे बढ़ाती नजर आयीं अपने भाषण में वे कहती हैं,धर्म बचाने का ठेका गरीबों ने नहीं ले रखा शहरों के अमीर हिन्दू बीफ खाते हैं और शहरों के अमीर मुसलमान शराब का लुत्फ लेते हैं गाँव के गरीब धर्म बचाते रह जाते हैं ।

शेहला अभी नयी नयी राजनीति में आई हैं शायद इसीलिए उन्हें ये मालूम नहीं कि भारत की राजनीति भावनाओं से जुड़ी हुई है धर्म की जिसमें महात्वपूर्ण भूमिका है और कन्हैया कुमार पर पहले ही देशद्रोह का इलजाम लग चुका है जो कि एक अलग भावनात्मक मुद्दा है जिसे भाजपा लगातार भुनाने की कोशिश करती आई है,आज भी उनके प्रवक्ताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक उनके खिलाफ “टुकड़े टुकड़े गैंग” शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं और अब उनके द्वारा धर्म को टारगेट करने से इसका खामियाजा कन्हैया को भुगतना पड़ सकता है ।

अभी तक कन्हैया कुमार द्वारा कोई गलती ना किये जाने का ही नतीजा है कि इतनी मुश्किलों के बावजूद भी वे मजबूती से अपनी बात रख पा रहे थे और बेगुसराय के बेटे के तौर पर खुदको पेश कर रहे थे,पर पता नहीं उनकी पार्टी को उन्हें राष्ट्रीय स्तर का नेता साबित करने की हड़बड़ी है या फिर उनके साथी सालों बाद उभरे एक नेता को कैसे पेश करना है ये समझ नहीं पा रहे हैं जिसके चलते वे ये गलतियां कर रहे हैं

अमित सिंह की धमकी भरी पोस्ट

कन्हैया के समर्थक तो उनके साथियों से भी एक कदम आगे निकलकर कन्हैया को वोट ना देने पर बेगुनाहों की लिंचिंग को समर्थन देने को तय्यार नजर आ रहे हैं सोशल मीडिया पर लिखकर वे कन्हैया के हारने पर मुसलमानों को सीधी धमकी देते नजर आ रहे हैं,अब ये देखने वाली बात यह होगी अपनों द्वारा पैदा की जा रही इन तमाम मुश्किलों से कन्हैया कुमार कैसे पार पाते हैं ।

सैय्यद असलम अहमद

राजनीतिक दल युवाओं से डरते है क्या?

बार बार मुझे ऐसा ही लगता है यह दल “परिपक्वता” की बात करते रहते है,यह दल “ज़िम्मेदार” होने की बात करते रहते है,यह दल “अनुभवी” होने की बात करते रहते है ऐसे कैसे होगा कि परिपक्वता सिर्फ पीछे रहने से आएगी? भगत सिंह 19 साल की उम्र में अपनी ज़िम्मेदारी समझ गए थे,20 या 21 साल में तो अपने दल के अहम पद पर थे वो, और बात सिर्फ उन्ही की नही है और बहुत से ज़िम्मेदार लोग मौलाना आज़ाद सबसे कम उम्र के कांग्रेसी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे लेकिन अब युवा चेहरों से इतनी दूरी यह दल क्यों बना लेते है?

कांग्रेस पूर्वी दिल्ली से 82 वर्षीय शीला दीक्षित को उम्मीदवार बना रही है,जो कि दिल्ली की अध्यक्ष भी है आखिर क्यों? क्यों 80 वर्षीय मुलायम सिंह यादव को चुनाव लड़ाया जा रहा है? क्यों आडवानी को 92 साल की उम्र में भी प्रत्याशी न बनाये जाने पर हंगामा हो रहा था,और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र 69 वर्षीय है,और अगली बार फिर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार है,सवाल किसी पर पर्सनल अटैक का नही है सवाल है दुनिया के सबसे युवा देश की राजनीति में युवाओं के प्रतिनिधित्व का,ठीक है ज़्यादा उम्र के साथ व्यक्ति अनुभवी होता है,परिपक्व होता है,ज़िम्मेदार होता है और युवाओं को उन जैसा अनुभव नही हो सकता है और हर बार युवाओं को अपने बड़ो के मार्गदर्शन की ज़रूरत है।

लेकिन क्या युवा कुछ भी नही होता है?

सोचने की बात है अभी चंद महीनो पहले राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नही बनाया गया,अशोक गहलोत को बनाया गया,और यही काम मध्यप्रदेश में भी हुआ,आखिर क्या वजह है कि राजनीतिक दल युवाओं को “कार्यकर्ता” ही बनाते है,विधायक, सांसद बनाते हुए कतराते है,या बनाते है तो बहुत कम,क्यों ऐसा नही होता है? या फिर अगर युवाओं को तरज़ीह दी जाती है तो पुराने नेताओं के सुपुत्र और सुपुत्रियों को ही,आज़म खान,राजनाथ सिंह,दिग्विजय सिंह या कमलनाथ मिसाल है हमारे सामने, आखिर “युवाओं का देश” 60 से ऊपर वाले नेता ही क्यों चला रहे है?

क्या इस देश को युवाओं को “नेता” ही बनना है? बिल्कुल हमे अनुभवी,बुज़ुर्ग और ज़िम्मेदार बड़े नेताओं की ज़रूरत है,उनका मार्गदर्शन ज़रूरी है,लेकिन क्या ऐसे काम चल सकता है? सोचने की बात है बार बार की यह क्या हो रहा है क्यों हो रहा है? क्या वजह है? इन सभी नेताओं का राजनीति का अनुभव है ,देश के लिए मुलायम सिंह जैसे नेताओं की ज़रूरत है,मगर चुनावों में युवाओं की ज़रूरत है या नही? यह बड़ा और अहम सवाल है। #Youth #IndianPolitics

लेखक – असद शेख़

 

#एजुकेशन_फॉर_यूथ के एनुअल डे पर आयोजित हुआ प्रतिभा सम्मान समारोह,मेधावी छात्र हुए सम्मानित !

आज दिनांक 14/04/2019 रविवार को #एजुकेशनफॉरयूथ के एनुअल डे पर आयोजित प्रतिभा सम्मान समारोह में मेधावी बच्चों को पुरुस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन किया गया,साथ ही टीम एजुकेशन फॉर यूथ को एक साल पूरा होने पर सभी एक्टिव मेंबर्स को भी स्मृती चिन्ह देकर सम्मानित किया गया और टीम EFY की तरफ से टीम के अध्यक्ष एडवोकेट एच आर खान को स्पेशल शुक्रिया कहा गया टीम को बनाने और उनको जोड़े रखने के लिए ।

इस मौके पर प्रोग्राम का आरंभ मौलाना जुबेर अहमद कासमी ने कुरान की तिलावत के साथ किया,उसके बाद EFY के अध्यक्ष एडवोकेट एच आर ख़ान,जस्टिस फाउंडेशन के सदर एडवोकेट ज़ाहिद ताज,सोशल एक्टिविस्ट शहज़ाद अली, डॉक्टर अब्दुल कलाम,मुश्ताक बाशा,हाकिमीन कुरैशी, इंजीनियर आफताब खान, मोहम्मद मोहतसिम, इमरान अली,तबरेज़ सिद्दिकी,उस्मान कुरैशी आदि ने एजुकेशन के महत्व पर अपनी बात रखी ।

मुश्ताक बाशा साहब ने शिक्षा के महत्व को मद्देनज़र रखते हुए कहा कि शिक्षा सिर्फ पैसे कमाने का ज़रिया नही बल्कि जीवन स्तर में ज़रूरी परिवर्तन लाकर बेहतर बनाने का ज़रिया है।

अपनी बात रखते हुए डॉक्टर अब्दुल कलाम ने इस्लाम में शिक्षा के महत्व को बताते हुए कहा कि,जिस क़ौम का वजूद ही इक़रा से शुरू हुअा वह क़ौम आज तालीम के मामलो मे सबसे ज़्यादा पिछड़ रही है, पैगंबर मोहम्मद साहब (स०) ने कहा है की तालीम हमारा हथियार है, और जंगे बदर के बाद का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कैसे जब 70 लोग गिरफ्तार करके पैगंबर मोहम्मद (स०) के सामने लाए जाते हैं तो वे ये शर्त रखते हैं कि तुम मे से हर एक जो भी पढ़ना लिखना जानता है वो मदीने के 10 बच्चों को पढ़ना लिखना सिखाएगा तो उसको आज़ाद कर दिया जाएगा इसमें ये देखनी वाली बात है की गैर मुस्लिमों से कि जिनसे किसी तरह की कोई दीनी, फ़िक़्ह या कुरआन की तालीम की उम्मीद नहीं थी बावजूद इसके भी पैगंबर मोहम्मद (स०) ने उनके सामने बच्चों को पढ़ाने की शर्त रखी जो ये बताने के लिए काफी है कि एक मुसलमाँ के लिए दीनी और दुनियावी दोनो की तालीम की अपनी अपनी अहमियत है ।

एडवोकेट ज़ाहिद ताज ने मौजूदा एजुकेशन सिस्टम की जमकर आलोचना करते हुए बच्चों के गार्जियन को मुखातिब करते हुए कहा कि घर में मिली तरबियत किसी भी तालीम से ज़्यादा अहमियत रखती है वही तय करती है कि उनका बच्चा कहाँ तक जायेगा ।

एक्टिविस्ट शहजाद अली ने बताया कैसे आज के दौर में दीनी और दुनियावी दोनो तालीम बेहद ज़रूरी है और कैसे एजुकेशन फॉर यूथ इसके लिए मेहनत कर रहा है ।

इस प्रोग्राम की खासियत रही कि इसमें चीफ गेस्ट कोई नहीं था पर तीन स्पेशल गेस्ट थे जो कि तीनों ही स्टूडेंट्स हैं ज़ाकिर रियाज़ जो कि जामिया यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रहे हैं, इमरान जो M.A करने के बाद अब सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर भी सक्रिय हैं और असद शैख जो मौजूदा वक़्त में M.A करने के साथ साथ फ्रीलांस जर्नलिस्ट और एक सक्रिय सोशल एक्टिविस्ट हैं ।

तीनो ही खास मेहमानों ने बच्चों को पढ़ाई का महत्व बताते हुए अपने अनुभव साझा किए कि कैसे वे भी एक मामूली स्कूल से शुरू होकर वे आज मंच से संबोधित करने लायक हुए।
इमरान ने अपने संबोधन में एजुकेशन फॉर यूथ के अध्यक्ष को उनके सोशल एक्टिविज़्म करने वाले तमाम संगठनों को साथ लाने के प्रयासों की सराहना करते हुए मुबारकबाद भी दी उन्होंने कहा जहां तमाम लोग अलग चलना पसंद करते हैं वहीं कोई तो है जो सबको साथ लेकर चलने की बात करता है ।

ज़ाकिर रियाज़ ने बच्चों से कहा कि आप कहां और किन हालातों में पैदा होते हैं ये आप तय नहीं कर सकते पर आप कैसे ज़िन्दगी जियेंगे ये तय करना आपके हाथ में होता है, एजुकेशन आपको ज़िन्दगी जीने का सलीक़ा और एक नज़रिया देती है ।

असद शैख ने बच्चों को प्रेरित करते हुए उन्हें ये बताया कि इस देश के ज़्यादातर महान लोग छोटे घरों से थे इसके बावजूद तमाम कठिनाईयों को पार कर देश और दुनिया में नाम रौशन कर गये ।

इस प्रोग्राम की सबसे खास बात रही टीम एजुकेशन फॉर यूथ की ओर से मोहम्मद मोहतसिम ने बताया उनकी टीम के ड्रीम प्रोजेक्ट स्कूल का नाम अलिफ़ इंटरनेशनल होगा जहाँ हिंदी इंग्लिश के साथ साथ उर्दू और अरेबिक भी सब्जेक्ट के तौर पर पढाई जायेगी और इस स्कूल में किसी भी बच्चे के साथ जातिगत आधार पर भेदभाव नहीं होगा इसमें हर जरूरतमंद बच्चे का एडमिशन होगा ताकि इस मुल्क की तस्वीर को बेहतर बनाया जा सके ।

इस कार्यक्रम का मंच संचालन इंजीनियर आफताब हुसैन खान ने किया ।

सत्ताधरी दल की कठपुतली बन बैठे हैं कन्हैया कुमार ?

कन्हैया कुमार के फेसबुक पेज से

देश के इस चुनावी समर में अगर जिस लोकसभा सीट की सबसे ज्यादा चर्चा है वो बेगूसराय है जहाँ से JNU के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं,बेगुसराय से चुनाव लड़ना पूरी तरह से उनका संवैधानिक अधिकार है उनकी जगह अगर कोई और भी बेगुसराय से ही लड़ना चाहे तो लड़ सकता है हमारा संविधान इसकी पूरी इजाजत देता है ,मैं तो कहता हूँ कन्हैया को भी राहुल और मोदी की तरह ही दो जगहों से चुनाव लड़ना चाहिए था इसमें बिलकुल भी कोई बुराई नहीं है ।

पर कन्हैया कुमार ने जैसे खुदको और इस चुना पेश किया वो जरूर सोचने वाली बात है, क्योंकि कन्हैया कुमार कहते हैं बेगुसराय में लड़ाई उनके और भाजपा के मौजूदा सांसद गिरराज सिंह के बीच है,जो कि सरासर ग़लत बात है, सच तो ये है गठबंधन तय हो जाने के बाद बेगुसराय में कन्हैया की स्थिति खरपतवार की तरह हो गयी,और इसीलिए गठबंधन ने  कन्हैया की जगह तनवीर हसन को टिकट दिया जो कि जाईज बात भी है,कि वहाँ से तनवीर हसन को ही टिकट मिले जहाँ से वे बिना गठबंधन के मोदी लहर के दौर में भी दूसरे नंबर के प्रत्याशी रहे,पर तनवीर हसन जो हर लिहाज से कन्हैया और गिरराज सिंह पर भरी हैं उनको गोदी मीडिया के प्रोपगंडा में फँसा कर पूरी तरह से सीन से गायब करने की कोशिश की जा रही है जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक बात है ।

तनवीर हसन की पहचान सिर्फ इतनी नहीं है कि वे एक “मुस्लिम नेता” हैं या फिर रजद के प्रत्याशी भर हैं,वे एक पूर्णरूप से प्रभावी नेता हैं और कन्हैया कुमार से कहीं ज्यादा काबिलियत और तर्जुबा रखते हैं, मैं ये नहीं कहता कि तनवीर हसन ही बेगुसराय से आखिरी ऑप्सन थे पर मैं ये जरूर कहता हूँ वे बेहतर ऑप्सन हैं इस लोकसभा सीट के लिए जहाँ वे आसानी से भाजपा प्रत्त्याशी गिरराज सिंह को हरा सकते हैं ।

अगर देखा जाए तो यहाँ कन्हैया कुमार ने परोक्ष रूप से माइनॉरिटी का एक प्रतिनिधि कम करने की कोशिश की है,कन्हैया राजनीति में नये जरूर हैं पर उन्हें राजनीति में संख्याबल का ज्ञान नहीं होगा ये जरा कम समझ में आने वाली बात है मुझे पूरी उम्मीद है कि कन्हैया को वो चैप्टर जब एक ही वोट से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार गिर गई थी जेएनयू जैसे देश के सर्वोच्च शिक्षण संस्थान में जरूर पढ़ने और समझने को मिला होगा जिसके कि वे छात्रसभा अध्यक्ष भी रहे हैं ।

इस देश में सबसे बड़ा वर्ग युवावर्ग है और उसकी राजनीति में सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है,और कन्हैया कुमार जैसे युवाओं का बिलकुल स्वागत होना चाहिए पर क्या हमें उन युवाओं की राजनैतिक समझ को परखने की जरूरत नहीं है? नरेंद्र मोदी की मुखरता से आलोचना करने वाले और उनके समर्थकों को अंधभक्त कहकर संबोधित करने वाले कन्हैया कुमार उनके साथी और उनके समर्थकों ने तो हु ब हू नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों के जैसी भाषा उनका ही रवैया अपना लिया है ! नरेंद्र मोदी की आलोचना तो आप प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद नहीं कर पा रहे थे क्योंकि तब उनके लिए सैंकड़ों करोड़ खर्च कर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी ने बकायदा ट्रोलरों की एक पूरी फौज आई टी सेल के रूप में खड़ी कर दी,पर कन्हैया ने ये काम भी बिना हींग फिटकरी का खर्च किये बेगुसराय में अपने ही समर्थन वाले गठबंधन के खिलाफ मैदान में उतरकर फ्री में ही कर लिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र भी हैं, ये भी इतिहास में दर्ज होगा कैसे एक जनसमर्थन को अपने हित में इस्तेमाल कर अपनी चालाकियों को अपनी वाकपटुता से ढाँका जा सकता है ।

कुल मिलाकर अगर देखा जाये तो परोक्ष रूप से गठबंधन का नुक़सान कर कन्हैया कुमार ने अप्रत्याक्ष रूप से मोदी सरकार की मदद करने की है क्योंकि जब वोट गठबंधन प्रत्त्याशी तनवीर हसन और कन्हैया कुमार के बीच बँटेगा जो कि तय है तब उसका फायदा गिरराज सिंह को “मिल सकता है” और कन्हैया कुमार जिस तरह से मीडिया में प्रोजेक्ट किये जा रहे हैं वो भी एक उदाहरण की वे सत्ताधारी दल को रास आ रहे हैं, क्योंकि आपको हर तरफ “गोदी मीडिया में” कन्हैया Vs गिरराज सिंह नजर आ रहा है तनवीर हसन जैसे मजबूत प्रत्याशी की भरपूर उपेक्षा की जा रही है और खुद प्रधानमंत्री हाल ही में टुकड़े टुकड़े गैंग जनता को चुनावी मंच से याद दिलाते नज़र आये हैं ।

लेख़क- सैय्यद असलम अहमद

राजनीति,युवा और देशभक्ति !

 

ये भारतीय राजनीति का अनदेखा दौर है जब विश्व के सबसे महान लोकतंत्र में होने वाले चुनाव को जिसे कि राष्ट्रीय उत्सव भी माना जाता है उसे अब पूरी तरह एक जंग में तब्दील कर दिया गया है,हर दिन ही कोई ना कोई कहीं से उठ खड़ा होता है और हमें ये बताकर डराने की कोशिश करने लगता है कि अगर हमने उनका साथ नहीं दिया और उनको नहीं चुना तो इस देश को बर्बाद होने से कोई भी नहीं बचा सकेगा.

पार्टियों की नीतियाँ भले ही अलग अलग हों पर डर का व्यापार तो लगभग हर पार्टी कर रही है, कुछ सत्ता पाने के लिए तो कुछ अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिए इसी माहौल को बनाकर रखना चाहते हैं जहाँ हर व्यक्ति खुदको पहले से ज्यादा असुरक्षित मेहसूस करे और वो अपनी सोचने समझने ‌की ताक़त खोकर सिर्फ उन्ही के हाँथों की कठपुतली बनकर रह जाएँ । इस होड़ में भी अभी तक सत्ताधारी दल के नेता ही सबसे आगे नजर आ रहे हैं । जैसे अभी कल ही माननीय नरेंद्र मोदी जो कि सौभाग्य से इस देश के “प्रधानमंत्री भी हैं (हैरान मत हों) उन्हें अक्सर ही ये बात याद दिलवाने की जरूरत पड़ती रहती है कि वे सिर्फ बीजेपी के नेता या प्रचारक नहीं इस देश के प्रधानमंत्री भी हैं ।

कल एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ये
कहते हुए नज़र आते हैं कि मैं पहली बार वोट डालने जा रहे नौजवानों से ये कहना चाहता हूँ की आप पहली बार वोट डालने जा रहे हैं पहली बार दिया गया वोट हमेशा याद रहता है  “आपका ये पहला वोट ” पुलवामा के शहीदों के नाम हो सकता है क्या?”।

आखिर क्यों नरेन्द्र मोदी को ये बात कहने की जरूरत आ पड़ी ? थोड़ी फुरसत निकाल कर इसपर गौर कीजिये और मुमकिन हो सके तो अभी कीजिए,क्योंकि वो कहावत तो सुनी ही होगी आपने कि “अब पछताये होता का जब चिड़िया चुग गई खेत”। अखिर पिछले पांच सालों के शासन काल में प्रधानमंत्री की एकमात्र उपलब्धि पुलवामा के शहीद तो नहीं ना? तो फिर क्यों उन्हें ये शब्द इस्तेमाल किये ? क्योंकि देशभक्ति और उससे जुड़े तमाम विषय जैसे देश,सेना,बहादुरी,महानता ही वो ब्राह्मस्त्र हैं जिसमे देशप्रेम+डर+भावुकता=वोट तक पोंहचने की अचूक क्षमता है।

भारत ही  एकमात्र वो देश नहीं है जहाँ डर+देशभक्ति को एक प्रोडक्ट बनाकर जनता का वोट हासिल करने की कोशिश की जा रही है या जनमत हासिल किया गया है अगर आप इतिहास खंगालने जायेंगे तो सिंकदर से लेकर हिटलर और ट्रंप से लेकर मोदी तक सबने इसका भरपूर इस्तमाल किया है और कर रहे हैं ।

आज ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कहते हैं “हिंदुओ के पास बीजेपी के अलावा कोई विकल्प नहीं” । क्या और क्यों विकल्प नहीं है क्या किसी मीडिया न्यूज चैनल या किसी जनप्रतिनिधि को नहीं चाहिए कि वे आदित्यनाथ से सवाल करें की उनकी बात का अर्थ क्या है,और आखिर क्यों वे आज ये बात कहकर हिंदू जो इस देश का बहुसंख्यक भी है जो आज भी राष्ट्रपति से लेकर चीफ जस्टिस की कुर्सी तक पर भी विराजमान है,उस बहुसंख्यक को दीन-हीन और शोषित बताने की कोशिश कर रहे हैं?

मौजूदा समय में मुझे फिल्म 3 इडियट्स का वो सीन याद आ रहा है जिसमें प्रोफेसर स्टूडेंट को बताता है,कि ज़िन्दगी एक जंग है जहाँ कमजोर के लिए कोई जगह नहीं इसलिए इसे एक जंग की तरह ही लो और कमजोरों को कुचलते हुए आगे बढ़ते रहो वरना हार जाओगे ।

बड़े अफसोस की बात है ये कि जो देश आज भी गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी,अशिक्षा,खुशहाली में पिछड़ा हुआ है,उस देश के नेता आज भी जनता को राष्ट्रवाद की अफीम चखा कर फिर छलने की कोशिश कर रहे हैं। डॉक्टर अब्दुल कलाम ने अपने एक भाषण में कहा था भारत युवाओं का देश है युवा उम्मीदों का देश है और मुझे पूर्ण विश्वास है इस देश का नौजवान आने वाले वक्त में भारत को एक महान महाशक्ति बनाने में अहम भूमिका निभायेगा ।

लेखक – सैय्यद असलम अहमद

मोदी विरोध ही एकमात्र क़ाबलियत है क्या इस लेफ्ट के योद्धा की?


अवाम की आवाज़ ब्यूरो – कन्हैया कुमार को लेकर आज कल राजनैतिक हलकों में काफी गहमागहमी देखने में आ रही है और सोशल मीडिया पर भी तमाम तरह के विरोधाभाषी विचारों के साथ उसकी हार जीत के कयास लगाये जा रहें हैं,जेएनयू प्रकरण के वक्त चर्चा में आये कन्हैया कुमार आज पूरी तरह से राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय हैं ।

कुछ लोग यहाँ तक मानते हैं कि कन्हैया कुमार उत्तरी भारत में लगभग गायब हो चुके लेफ्ट की आखिरी उम्मीद हैं,पर बड़ा सवाल ये है कि क्या कन्हैया कुमार भारतीय राजनीति में कुछ अलग करने का माद्दा रखते हैं? मौजूदा समय में राजनीति तो भागों में बँटी नजर आती है एक तरफ है,हर हद पार कर जाने को तैयार “हिंदुत्ववादी Pro राष्ट्रवाद जिसके कि “इकलौते ब्रांड एम्बेसडर नरेंद्र मोदी हैं “,तो वहीं दूसरी तरफ “कथित” फाँसीवादी नरेंद्र मोदी को हराने के लिए हर दल ताल ठोंक रहा है यहाँ तक की महागठबंधन से लेकर काँग्रेस और आम आदमी पार्टी तक हर पार्टी का एक ही स्लोगन है मोदी को हराने के लिए हमें वोट दें ।

मजेदार बात ये है कि लेफ्ट जिसकी छवि लिब्ररल और इंटुएक्चल लोगों के दल की रही है उसी लेफ्ट के कैंडिडेट कन्हैया कुमार की भी पूरी राजनीति भी फिलहाल सिर्फ और सिर्फ मोदी विरोध पर ही टिकी है,यहाँ तक कि जैसे बाकी स्थापित नेताओं के नारे हैं,सेम टू सेम वही नारे और स्लोगन कन्हैया कुमार भी इस्तेमाल कर रहे हैं और शायद उन्हें करने भी चाहिए क्योंकी हवा के साथ चलना हमेशा सुविधाजनक रहता है।

पर यहाँ सवाल ये आता है कि उनका विजन क्या है और मुद्दे क्या हैं? नमांकन पत्र दाखिल होने तक तो कन्हैया कुमार की एकमात्र काबिलियत एक अच्छा मोदी विरोधी होना भर रही है,आगे वो क्या कदम उठाते हैं ये देखना दिलचस्प होगा । कन्हैया कुमार अच्छे वाक्ता हैं और उपलब्ध भी रहे तो तो मीडिया और सोशल मीडिया के कथित ठेकेदारों की मेहरबानी से वे अब नेता तो बनने जा रहे हैं पर वे इस राजनीति कसौटी पर कितने खरे उतरेंगे वो देखने वाली बात होगी ।

कुछ मामलों में कन्हैया कुमार ने परिपक्वता भी दिखाई है जिसमें कि उनके दल ने भी उनका पूरा साथ दिया है जैसे कि तमाम विरोध के बावजूद भी बेगुसराय से ही चुनाव लड़ना और क्राउड फंडिंग के जरिए बिना किसी विरोध के चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित “अधिकतम” राशि को अपने चुनावी अभियान के लिए जुटाने की कोशिश करना । पर आगे आने वाले वक्त में इस लोकसभा चुनाव के बाद वे अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को कैसे और किस हद तक पूरा कर पाते हैं ये ही बात उनके और लेफ्ट के भविष्य को निर्धारित करेगी ।

इमरान पर बेवजह ऐतराज क्यूँ ?

फोटो इमरान के फेसबुक पेज से

इमरान प्रतापगढ़ी को मुरादाबाद से इसीलिए चुनाव नही लड़ना चाहिए क्योंकि वो बाहर से हैं  ठीक है माना, तो महोदय यह बताइये अखिलेश यादव आजमगढ़ से चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? नरेन्द्र मोदी क्यों बनारस से चुनाव लड़ कर जीते ? या राहुल गांधी अमेठी से क्यों चुनाव लड़ते हैं? और अब तो वायनाड(केरल) से भी? अच्छा अच्छा अखिलेश यादव ,राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय नेता हैं इसलिए यह लोग कही से भी चुनाव लड़ सकते हैं? लेकिन “इमरान” राष्ट्रीय नेता नही हो सकता इसलिए उन्हें चुनाव नही लड़ना चाहिए? इमरान प्रतापगढ़ी तो “गवय्या” है ढाई लाख रुपये लेते है एक मुशायरे के इसलिए उसे “नेता” होने का कोई हक नही है,है न? तो कुमार विश्वास कौन है? क्या आपने कभी कुमार विश्वास के लिए इसी भाषा का इस्तेमाल किया है? कभी भी? क्यों उन्हें तो राज्यसभा भेजने की कोशिश में थे या नही?

 

आखिर क्यों आपको दिन रात मुस्लिम समुदाय के लिए बात करने वाला सवाल करने वाला असदुद्दीन ओवैसी “विलेन” नज़र आते है क्यों? क्या वजह है? क्या नुकसान कर दिया आपका? अच्छा चलिये छोड़िये,ठीक है,मैं गलत हूँ ,मान ली आपकी बात ,आप “दिलवाले” लोगो की आप ही की बात तो मानी जाती है हर बार जब आप कहते हो,आज़म खान,असदुद्दीन ओवैसी,अहमद पटेल,ग़ुलाम नबी आजाद,,या और भी बहुत से यह सब “बुरे” नेता है,और पता है आप क्यों कहते है क्योंकि आपके अंदर “एहसासे कमतरी” है,बहुत ज़्यादा इतनी ज़्यादा की पूरी की पूरी यूनिवर्सिटी तैयार करके देने वाले आज़म खान आपको बुरे नज़र आने लगते है कब जब वो मीडिया द्वारा “तोड़ मरोड़” भाषण देकर हाइलाइट हो जाते हैं तो यह आपकी ज़िम्मेदारी हो जाती है तो आप अपनी “छवि” सुधारने के लिए आप इन्हें बुरा भला कहते हैं ,और इतना कि आप खुद को संतुष्ट कर लेते हैं,और यह बात सिर्फ इमरान प्रतापगढ़ी की नही है बात असदुद्दीन ओवैसी की नही है बात आज़म खान की नही है ,बात यह है कि जो माहौल बनाया गया है या जो बताया गया है उसमे आप कन्हैया कुमार को सपोर्ट कर सकते हो कोई मसला नही है लेकिन उसी सीट पर पहले से लड़ते आ रहे “तनवीर हसन” को सपोर्ट नही कर सकते है वरना आप “प्रगतिशील” नही हो और आपको प्रकाश राज का समर्थन इसीलिए करना चाहिए कि क्योंकि वो लिंचिंग से मुद्दे पर बोलते आये है लेकिन आप उस मुद्दे को संसद में उठाने वाले ओवैसी को बुरा ही समझेंगे? क्यों? क्यों? क्यों? वो इसलिए क्योंकि अगर आप उर्दू नाम वाले का समर्थन भी करते है तो आप बुरे बन जाते हो ,इसलिए ज़रूरी है कि आप इन लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा बुराई करो,इन्हें कोसों इन्हें “ट्रोल” करो, इनके खिलाफ सोशल मीडिया पर मुहिम चलाओ है न?

देखिये चुनाव अपनी जगह,राजनीति अपनी जगह,लेकिन यह देश संविधान से चलता है ओर संविधान सबको बराबर हक़ देता है,कही आप भूल तो नही गए है इस हक़ को? और चुनाव लड़ना भी उसी में से एक है,तो इमरान प्रतापगढ़ी उसी तरह कही से भी चुनाव लड़ सकते है जिस तरह कोई और नेता लड़ता है आपको आलोचना करनी है करिये हक़ है आपके,कन्हैया कुमार को जीतना चाहिए,अच्छी बात है लेकिन इसका मतलब यह नही की तनवीर हसन को “विलेन” आप बना दें,और बार बार इस बात को ध्यान रखिये यह मुल्क “आपका” है,आपने अपने खून से सींचा है इस मुल्क को जान दी है,माल दिया है उम्र दी है,यह मुल्क 125 करोड़ भारतीयों का है,इस बात को हल्का मत समझिये,यह मुल्क संविधान से चलता है और चलेगा भी… एहसास कमतरी अच्छी चीज नही है इसे खत्म करिये अच्छा लगेगा….

#देशचुनावराजनीति
#Politics

लेख़क-असद शेख

असद शेख़

1.2करोड की जॉब देकर गूगल ने माना IIT की प्रवेश परीक्षा में फेल इस “मुस्लिम” छात्र की प्रतिभा का लोहा 

अब्दुल्लाह खान मुंबई के मीरा रोड स्थित श्री एल आर तिवारी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र हैं, उन्होंने इस बारे में बात करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी गूगल में नौकरी के लिए अप्लाई नहीं किया । कंपनी ने उन्हें एक कंपिटीशन प्रोग्राम चैलैंज होस्ट करने वाली साइट पर उनका प्रोफाइल देखकर उन्हें बुलाया , उन्होंने कहा इस कॉल की उन्हे बिलकुल उम्मीद नहीं थी यहाँ तक कि उन्होंने इस कॉम्पटीशन में नौकरी मिलने की उम्मीद से हिस्सा नहीं लिया था ये तो उन्होंने बस फन के लिए किया था ।

अब्दुल्लाह को पिछले साल नवंबर में गूगल की तरफ से ऑफीशियल ईमेल आया जिसके बाद उनकी जिंदगी बदल गयी,इस ईमेल को देखकर पहले तो वे हैरान हुये फिर उन्होंने अपने एक दोस्त को वो ईमेल दिखाया जो ऐसे ही किसी दूसरे शख्स को भी जानता था जिसे भी ऐसा ही ईमेल आया था। अब्दुल्लाह को आये इस ईमेल में लिखा था कि कंपनी को उनका प्रोफाइल एक वेबसाइट पर मिला है,इसके बाद उनके कई राउंड इंटरव्यू हुऐ और इसके बाद इस महीने गूगल के लंदन ऑफिस में उनकी फाईनल स्क्रीनिंग राउंड हुआ ।

अब्दुल्लाह खान ने सऊदी अरब से अपनी स्कूल की पढ़ाई की और इसके बाद वे मुंबई शिफ्ट हो गये, उन्होंने IIT की तय्यारी की लेकिन वे सफल नहीं हुये,जिसके बाद जिस पोस्ट के लिए वे अब 1.2 करोड़ के पैकेज पर सिलेक्ट हुये हैं उसकी बेसिक सैलरी भी तकरीबन 55 लाख है ।

अब्दुल्लाह की कामयाबी इस मायने में भी बड़ी है वे IIT से नहीं आते फिर भी आज गूगल ने खुद आगे आकर उन्हें जॉब ऑफर की है, इसीलिए कहते हैं प्रतिभा अपना लोहा मनवा ही लेती है ।