संसद में गूंजते इन पूंजीवादी धार्मिक नारों के बीच आपका हित यानि जनहित कहाँ है?

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कमाल का मुल्क है हमारा और गजब के नुमाइंदे चुने हैं हमने,और न्यूज एंकरों की महिमा अपरम्पार है,कल जो कुछ हुआ संसद में वो तो हैरतअंगेज था ही पर जो नंगा नाच कल न्यूज स्टूडियोज में हुआ वो भी कम ऐतिहासिक नहीं है ।

अभी एक मित्र की पोस्ट पढ़ी किस तरह एक खेल (क्रिकेट) को खेल भावना से दूर कर जंग का मैदान बना दिया जाता है जब भी भारत और पाकिस्तान आमने सामने होते हैं,और ऐसा सिर्फ एक हमारे ही महान मुल्क में नहीं होता हमारा पड़ोसी मुल्क भी हमसे चार हाथ आगे निकल जाता है ।

अभी हाल ही में एक विज्ञापन में भारत-पाकिस्तान के मैच से पहले भारत को पाकिस्तान का बाप बताया गया था जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में भी एक विज्ञापन लाया गया, जिसमें विंग कमांडर अभिनंदन के जैसे दिखने वाले व्यक्ति के जरिए भारत को निशाना बनाया गया ।

अब आप सोच रहे होंगे संसद और क्रिकेट मैच दो अलग अलग विषय की बात यहां एक साथ क्यों की जा रही है, दरअसल हम ज्यादा समझदार लोग हैं इसलिए लोड ज्यादा लेने की आदत पड़ चुकी है,खैर मेन मुद्दे पर आते हैं आखिर जरूरत क्यों आन पड़ी दोनो विषय की बात एक साथ करने की ।

दरअसल दोनों ही विषय बाजार (मार्केटिंग) से जुड़े हैं जिसमें ब्रांड वैल्यू ही हमेशा मायने रखती है आम लोग या तो इतने मासूम हैं या फिर इतने शातिर कि वे हमेशा वो रिएक्शन देते हैं या देने पर मजबूर होते हैं जो बाजार चाहता है,भारत और पाकिस्तान में दो अलग अलग ऐड बनाने वाली ऐड ऐजेंसी भी अगर एक ही निकल आये तो कतई हैरानी की बात नहीं होगी, देखिए व्यापार करने के दो ही तरीके होते हैं जितना भी अब तक सुना,पढ़ा,और जाना है जिसमें हमेशा ही दो थ्योरी लगायीं जाती हैं,या तो आप जरूरत के अनुसार बाजार सजायें या बाजार सजा को कर जरूरत पैदा करें ।

अब इसे कहते क्या हैं ये तो मैं नहीं बता सकता पर ये दोनों ही थ्योरी लॉजिकली करेक्ट और प्रभावी हैं,मिसाल के तौर पर कुछ समय पहले एक फूड ऐप इंस्टॉल की थी जिसपर शुरूआती 15 दिनों तक बंपर ऑफर मिले यहां तक कि मैने 18₹ में घर बैठे भरपेट खाया,अब इन 15 दिनों का असर ये हुआ कि मैं जो बाहर सिर्फ मजबूरी में खाने जाता था मजे में ऑर्डर करने लगा,चार माले नीचे उतर कर फिर पाँच सौ मीटर चलकर कुछ खरीद कर लाने की जगह बैठे बैठे ऑर्डर करने लगा ।

भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बहोत अच्छे कभी नहीं रहे पर दोनो के बीच व्यापार पूर्ण रूप से कभी बंद नहीं हुआ भले हम आपस में तीन युद्ध लड़ लिए हों,या सालों हमारे प्रधानमंत्रियों में बातचीत नहीं रही हो,और आज भी यही हो रहा है जानते हैं क्यों? क्योंकि बाजार लोक,समाज,देश और धर्म में यकीन नहीं रखता वहाँ इनपुट और आउटपुट ही सारे फैसले तय करता है ।

अभी इसका एक और ताजा उदाहरण Honor Vs Google के बीच छिड़ी जंग को देखकर आप समझ सकते हैं कैसे दो कंपनियों की जंग में देश दखल दे रहे हैं।

मौजूदा समय में पूरी कोशिश की जा रही है भारतीय राजनीति को दो हिस्सों में बाँटने की जहां दलों और लोगों की पहचान धार्मिक हो जाये और फिर जो संविधान के आर्टिकल 26 में स्टेट के सैक्यूलर होने की जो मजबूरी है वो खत्म हो सके,2014 के बाद से जबसे एक कथित हिंदुत्ववादी दल सत्ता में आया है तब से इसकी गति और तेज हुई है जो मीडिया जैसे अपने हर टूल का इस्तेमाल कर इसमें लगातार तेजी लाने के प्रयास में लगा हुआ है, जिसमें रिएक्शन पॉलिटिक्स करने वाले सभी दल और नेता मैन स्ट्रीम मीडिया में अक्सर सुर्खियां बटोरते पाये जाते हैं ।

सीमा और क्रिकेट के मैदान पर जो हाल भारतVsपाकिस्तान का है वही हाल देश के भीतर हिंदूVsमुसलमान का किया जा रहा है,अगर आप सोचते इससे किसी जात,धर्म,या पंथ का फायदा होगा ये उनके हित में होगा तो आप गलत हैं, क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ बाजार सियासत और राजनेताओं के हित में है ।

बिहार से लेकर बंगाल तक हाहकार मचा हुआ है देश मेडिकल इमरजेंसी और वॉटर इमरजेंसी जैसे हालातों से जूझ रहा है,पर हमारी संसद में धार्मिक नारे गूंज रहे,कभी सोचा है कि संसद में गूंजते इन पूंजीवादी धार्मिक नारों के बीच आपका हित यानि जनहित कहाँ है?

सैय्यद असलम अहमद

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