अपने सच से मुंह मोड़ लेने से कोई देश महान नहीं बनता

आर्टिकल 15 (फिल्म) की समीक्षा बहोत से लोग लिख रहे हैं,जहाँ कुछ इसकी तारीफ कर रहे हैं तो कुछ आलोचक भी हैं,जोकि एक साधारण सी बात है ऐसा होना भी चाहिए,और क्योंकि ये फिल्म हमारे मौलिक अधिकारों से जुड़ी है इसलिए इस पर चर्चा होना जरूरी भी है ।

इतनी सारी समीक्षाओं और चर्चाओं के बावजूद भी बहोत कम लोग हैं जो इसकी प्रासंगिकता पर भी बात कर रहे हैं,मौजूदा वक्त में इस एक फिल्म के जरिए काफी कुछ देखा और सीखा जा सकता है ।

अगर आप किसी मैट्रो शहर में बसते हैं तो इस बात की बेहद संभावना है कि आपको मालूम हो समानता का अधिकार सिर्फ आर्टिकल 15(सामाजिक समानता का अधिकार) तक नहीं है और ये फिल्म भी अपने सीमित शीर्षक से कहीं ज्यादा विस्तारित है इसमें निर्माता निर्देशक अनुभव सिन्हा ने बहोत कुशलता से आर्टिकल 14(न्यायिक समानता का अधिकार से लेकर) आर्टिकल 17 (अस्पृश्यता का अंत) तक को रेखांकित करने की कोशिश की है, हालांकि वे आर्टिकल 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) को नहीं छूते क्योंकि ये एक विस्तृत विषय है अगर वे इसे छूते तो उन्हें आराक्षण पर भी बात करना पड़ती उसकी प्रसांगिकता और उसके दुष्प्रभाव की भी बात करनी पड़ती, जिसे एक ही फिल्म में समाहित करना आसान बात नहीं है,आप इस विषय पर प्रकाश झा की आराक्षण(फिल्म)देख सकते हैं ।

भारत का संविधान अतुलनीय है पर क्या भारत के नागरिकों को अपने संविधान और संविधान में दिये गये उनके अधिकारों के बारे में मालूम है क्या हमने भारतीय संविधान की शिक्षा को हमारे स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया है?भारत जैसे विशाल देश में जहाँ गरीबों,किसानो, पिछड़ों और निराक्षरो की आबादी ज्यादा है और मूलतः ग्रामीण क्षेत्रों में बसती है,वहां आप ऐसी फिल्मों के जरिए लोगों तक उनके अधिकारों की बात आसानी से पोंहचा सकते हैं, अनुभव सिन्हा बेशक अच्छे इंसान होंगे पर ये फिल्म उन्होंने मुनाफा कमाने के लिए बनाई है इसमें दो राय नहीं है,पर ये भी उतना ही सच है कि उन्होंने एक अच्छा रास्ता भी दिखाया है इस फिल्म के जरिए कि कैसे रोचकता लाकर एक संवेदनशील विषय पर भी बात हो सकती है ।

इस फिल्म को लेकर जो विरोध हो रहा है सरकार को चाहिए उसके खिलाफ सख्त ऐक्शन ले और साथ ही फिल्म को कस्बाई और जिला स्तर के शहरों में कर मुक्त भी कर देना चाहिए, क्योंकि मल्टीप्लेक्स में इसे देखकर जहनी अय्याशी तो की जा सकती समीक्षायें लिखी जा सकती हैं,पर जब तक ये विषय ग्राम पंचायत स्तर तक नहीं पोंहचेगा इसकी कोई प्रासांगिकता नहीं रहेगी ऐसा नहीं है मैट्रो शहरों में अब समानता का अधिकार पूर्ण रूप से प्रभावी है और वहां इस तरह की समस्यायें नहीं हैं,बिलकुल हैं पर उतने बड़े स्तर पर नहीं हैं जैसे ये ग्रामीण स्तर पर व्याप्त हैं ।

मौलिक अधिकारों के बारे में जनता को जागरूक करना सरकारों की जिम्मेदारी है परंतु आजादी के इतने सालों बाद आज भी कहीं घोड़ी चढ़ने पर तो कहीं पानी लेने को लेकर की जाने वाली हत्याओं की खबर देखने सुनने को मिल जाती हैं,और जैसा कि इस फिल्म में दर्शाया भी गया है कि कैसे इस तरह की खबरों का बाहर आना भी अपने आप में बेहद मुश्किल काम है, अपने सच से मुंह मोड़कर कोई देश महान नहीं बनता महान बनने के लिए अपने सच को अपनाकर उसे बेहतर बनाने का प्रयास करना पड़ता है।

कोई भी देश परफैक्ट नहीं होता उसे परफैक्ट बनाना पड़ता है : फिल्म रंग दे बसंती के आखिरी सीन का ये संवाद आर्टिकल 15 देखते वक्त अगर आपके दिमाग में हो तब आप ज्यादा बेहतर तरीके से इस फिल्म को समझ पायेंगे ।

आखिर में बस इतना कहूँगा सरकार को और “लॉ इन ऑर्डर” को इस फिल्म से डरने की बिलकुल भी जरूरत नहीं है, क्योंकि ये फिल्म क्रांति पैदा नहीं करती ये फिल्म सिर्फ सवाल पैदा करती है व्यक्ति के स्वयं के प्रति सवाल,ये फिल्म व्यवस्था और सरकारी नीतियों पर सवाल तो करती है पर उसके प्रति आक्रोश नहीं पैदा करती जो कि अच्छी बात है,पर क्या आप जानते हैं आखिर ऐसा क्यों है? क्योंकि इस फिल्म में Zee Studio का पैसा लगा है जिसे सत्ता का करीबी माना जाता है अनुभव सिन्हा ने बेहद समझदारी और चालाकी से काम लेते हुए पूंजीवाद के सिद्धांत को काम में लाया है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें कोई भी स्थाई दोस्त,दुश्मन ,धर्म, जात,देश,सीमा और कोई पार्टी नहीं होती या मुनाफे से बड़ा कुछ नहीं होता,वरना मुमकिन ही नहीं था कि आप Zee के पैसे से कभी “कौन जात हो अम्मा” सुन पाते ।

सैय्यद असलम अहमद

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