23 साल कैद के बाद बेगुनाह साबित हुऐ अली भट्ट का भावनाओं के बाजार में स्वागत ।

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सोशल मीडिया पर एक वीडियो वाईरल हो जहा हैं जिसमें एक व्यक्ति कब्र पर औंधे मुँह लेटा हुआ है,दो व्यक्ति जो हाथों में कैमरा लिए हुए हैं वे इसे प्रोफ़ेशनल अंदाज़ में शूट कर रहे है, वीडियो आगे बढ़ने पर नजर आता है एक व्यक्ति उस औंधे मुँह लेटे व्यक्ति को उठाने के लिए आगे आता है,तभी वहीं मौजूदा अन्य व्यक्ति जो कैमरे की जद मे आने से बचते हुए उसे उठाने की कोशिश करने वाले व्यक्ति को ऐसा करने से मना करता नजर आता है ।

ये कब्र पर लेटा व्यक्ति मुहम्मद अली भट्ट है,22 मई सन 1996 को एक बस जो बीकानेर से आगरा जा रही थी,समलेकी नामक स्थान पर उस बस मे विस्फोट होता है और 14 लोग मारे जाते है और 37 घायल हो जाते हैं,उस घटना के कई आरोपियों में मुहम्मद अली भट्ट भी एक आरोपी था,जिन्दगी के अहम 23 साल जेल में गुज़ारने के बाद मुहम्मद अली भट्ट अदालत से निर्दोष साबित हुआ है,हमेशा की तरह सवाल फिर वही है कि उसके इन 23 सालों का हिसाब कौन देगा जो उसने बिना किसी गुनाह के जेल में गुज़ारे हैं,कांग्रेस की हुकूमत के वक़्त के दो ख़ौफ़नाक काग़ज़ी संगठन सिमी और इंडियन मुजाहिदीन “मुसलमानों औक़ात मे रहो” मुहीम को सलीक़े से अंजाम देते रहे,आजकल ये दोनो संगठन विलुप्त है,क्योंकि वर्तमान सरकार को ढक छुपकर कुछ भी करने की ज़रूरत नही है, आजकल तो फ़ैसला ऑन द स्पॉट किया जा रहा है,दोषी होने के लिये कोई आपत्तिजनक साहित्य बम बंदूक नहीं डेढ़ दो किलो गोश्त ही काफ़ी होता है ।

बात शुरू हुई थी कब्र पर औंधे मुँह लेटे मुहम्मद अली भट्ट से,मुहम्मद अली भट्ट जिस कब्र पर लेटा है वो उसके वालिद की क़ब्र है । 22 साल का वक़्त बहुत होता है,इस दौरान उसे पैरोल पर भी बाहर नही आने दिया गया क्योंकी वो एक ख़ूँख़ार आतंकवादी होने का आरोपी था । जेल से रिहा होने के बाद जब वो बाप को पुरसा देने क़ब्रिस्तान पहुँचा तो भावनाओं का ज्वार बर्दाश्त नही कर पाया और बाप की क़ब्र से लिपट गया,फिर वही हुआ जो ऊपर लिखा है ।

भावनाओं के व्यापार में मुनाफा बहुत और मेहनत कम है, इन्हीं भावनाओं के कई बड़े खिलाड़ी इस वक़्त तख़्तनशी है । वैसे इस खेल के छोटे मोटे खिलाड़ी हर जगह है । एक व्यक्ति जो 22 साल बाद अपनी बेगुनाही साबित कर जेल बाहर आता है । 22 साल पहले उसका बाप ज़िंदा था आज वो मिट्टी के नीचे दबा हुआ है । उसकी कैफ़ियत दूर बैठे हम आप महसूस कर सकते हैं। लेकिन दोनो प्रोफ़ेशनल कैमरा पर्सन को देखिए,उनके लिये मुहम्मद अली भट्ट भावनाओ के बाज़ार का वो कच्चा माल है जिसे नमक मिर्च लगाकर बाज़ार में बेचा जायेगा। ऐसा ही कुछ दिन पहले बाज़ार मे अभिनंदन था। ख़ैर वो बड़ा खेल था। इस छोटे खेल में भी कमज़ोर दिल वालों का तो कलेजा फट ही जायेगा,आवेश में मुट्ठियाँ तनेंगी,हुंकार उठेगी,और फिर सब शांत हो जायेगा हमेशा की तरह। लेकिन इसी सबके बीच किसी का मिशन पूरा होगा,कोई यूट्यूब चैनल हिट होगा,और फिर कहीं अगले शिकार की तलाश होगी। गिद्ध जो अब लुप्तप्राय है, इस पक्षी की ख़ासियत थी कि मरते जानवर के पास बैठ कर उसकी जान निकलने का इंतज़ार करता था। जान निकले की वो टूट पड़े। वो कालजयी फ़ोटो याद कीजिये जिसमें भूख से मरते बच्चे के पास गिद्ध बैठा है. उस फ़ोटोग्राफ़र मे इंसानियत ज़िंदा थी,वो इस मंज़र का सदमा बर्दाश्त नही कर पाया और उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। लेकिन आज ऐसा कहाँ होता है। इंसान के सदमे और इमोशन का बाज़ार बनाया जा चुका है। बैकग्राउंड में मातमी धुन डाल कर देखने वाले की आँख से आँसू निकाल अपनी जेबें जो भरनी होती हैं ।

दुनिया भर में इमोशन बहुत बड़ा बाज़ार है इसमें अनंत संभावनाएं हैं। पूँजीवाद अपने बाज़ार के लिये युद्ध करवाता है। जिसमे देश शहर तबाहो बर्बाद होते हैं। फिर बाज़ार वहाँ पहुँचता है। एनजीओ को पैसा देता है। एनजीओ आँसू पोंछते हैं। मातमी बैकग्राउंड म्यूज़िक के साथ डाक्यूमेंट्री बनती है। उस डाक्यूमेंट्री को बड़े बड़े ईनाम मिलते हैं,और फिर ये बाज़ार फलता फूलता रहता है।

हम सब इसी बाज़ार के ग्राहक हैं और मुहम्मद अली भट्ट जैसे लोग सामान हैं। जिसे कैसे हमारे सामने पेश करना है कि हम सीना पीटते हुए ख़रीदने दौड़े ये बाज़ार के व्यापारी तय करते है। कभी एक सन लाइट साबुन से नहाना धोना (कपड़ा) सब होता था. आज शरीर के हर हिस्से के लिए अलग साबुन,शैम्पू है। वैसे ही इमोशनल वाला धंधा है। कभी अभिनंदन है तो कभी मुहम्मद अली भट्ट है।

लेखक – इकबाल अहमद

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