फ़िल्मी गीतों की होली

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होली ही एक ऐसा त्यौहार है जिसमें राग, रंग, मस्ती, शरारत, खुलापन, हुड़दंग, हो-हल्ला, धमाल आदि सब एक साथ दिखता है। एकता और अखंडता का संदेश भी। वर्ग-जाति और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठ कर सभी सम्मिलित दिखते हैं।
ब्लैक एंड व्हाईट इरा में होली कम खेली जाती थी। रंगों के इफ़ेक्ट का पता नहीं चलता था। उस इरा की ‘गोदान’ का अंजान द्वारा रचित यह गाना बहुत लोकप्रिय था – होली खेलत नंदलाल बिरज में…। शकील के मन में होली की बहुत सुंदर तस्वीर थी….आज मन रंग लो जी आज तन रंग लो…(कोहिनूर). फिल्मों में जब-जब रंग आया तो शकील भी ‘मदर इंडिया’ में तन-मन से रंगीन हुए…होली आई रे, कन्हाई होली आई रे… ‘आन’ में शकील होली के बहाने विरह के साथ-साथ प्यार में अमीरी-गरीबी का भेदभाव मिटाते हैं…. खेलो रंग हमारे संग आज दिन रंग रंगीला आया, आज कोई राजा, ना आज कोई रानी है….।
होली हो और पिया संग चुहलबाज़ी न हो तो होली का मज़ा बेमज़ा है। ‘नवरंग’ में भरत व्यास की बानगी देखिये – आ रे जा रे हट नटखट, मुझे समझो न तुम भोली भाली रे…। इसी तरह राजेंद्र सिंह बेदी की ‘फागुन’ में मजरूह लिखते हैं – पिया संग खेलो होरी फागुन आयो रे…। यह गाना दुखांत साबित हुआ था। वहीदा ने साड़ी पर रंग डालने पर धर्मेंद्र को खूब-खरी खोटी सुनाई थी। यह फिल्म का टर्निंग पॉइंट था।
‘ज़ख़्मी’ में सुनील दत्त बदले की भावना से ओतप्रोत दिखते हैं – दिल में होली जल रही है…(गौहर कानपुरी)। ‘शोले’ की होली भला कौन भूल सकता है – होली के दिन दिल खिल जाते हैं, रंगों में रंग मिल जाते हैं…आगे हेमा मनुहार करती है…यही तेरी मर्ज़ी है तो ले पास आ के, न छूना मुझे चाहे दूर से भिगो ले…धर्मेंद्र भी कम नहीं हैं…हीरे की कनी है तू, मट्टी से बनी है तू, छूने से जो टूट जायेगी…(आनंद बक्शी)। धायें, धायें, धायें…डाकुओं ने हमला कर दिया। इतने उम्दा गाने का लुत्फ़ जाता रहा।
याद आ रहा है सत्तर के दशक में भट्ट बंधुओं के ‘होली आई रे’ में होली आई होली आई, देखो होली आई रे…गाने के खत्म होते ही नायिका बहक गयी थी। ‘कटी पतंग’ में विधवा नायिका आशा पारिख को राजेश खन्ना ने होली खेलने पर मजबूर किया – आज न छोड़ेंगे बस हमजोली, खेलेंगे हम होली रे..राजेश खन्ना का ज़िक्र होता है तो ‘आपकी क़सम’ याद आती है – जै जै शिवशंकर कांटा लगे ने कंकड़….’आख़िर क्यों’ की स्मिता पाटिल को कुढ़न होती है जब वो पति राकेश रोशन को टीना मुनीम के संग रंग की आड़ में रासलीला रचाते देखती है – सात रंग में खेल रही है दिल वालों की टोली…(इंदीवर)।
होली और अमिताभ बच्चन तो एक-दूसरे के पर्याय हैं। अस्सी के दशक के बाद जवां हुई पीढ़ी का सबसे पसंदीदा होलियाना – रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे…बेमौसम भी बच्चे से लेकर जवान तक खुद को रंगों से सरोबर समझते हुए थिरक उठते हैं। ‘सिलसिला’ का गाना है यह। रीयल लाईफ को एक समझौते के अंतर्गत रील लाईफ़ लाया गया था। अमिताभ-रेखा की रीयल लव स्टोरी का फ़ाईनल दफ़न। अमिताभ की होली ‘बाग़बान’ में भी सुपर हिट रही – होली खेलें रघुबीरा अवध में…

सदी बदली, मिजाज बदला और फिल्मों में होली का रंग भी बदला। देखिये नमूना – रंगों में है प्यार की बोली, जा रे जा डोंट टच माई चोली (वक़्त)…. छान के मोहल्ला सारा देखा लिया (एक्शन रीप्ले)…बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी, तो सीधी साधी छोरी शराबी हो गयी….जीन पहन के जो तूने मारा ठुमका, तो लट्टू पड़ोसन की भाभी हो गयी….(ये जवानी है दीवानी)।

लेखक वीर विनोद छाबड़ा

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