हैवानियत से फिर शर्मशार हुआ मंदसौर !

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मंदसौर में फिर इंसानियत  शर्मशार होती है कालूराम नाम का एक वहशी दरिंदा  बलात्कार करने के बाद फरार हो जाता है पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है क्यों? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि इस बार पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय से है?

अभी तकरीबन साल भर पहले की ही बात है ऐसा ही कुछ मामला सामने आया था  उस वक़्त धर्म के नाम पर खूब रोटियां सेंकी गई थीं क्योंकि तब पीड़ित बहुसंख्यक समाज से थी और आरोप उर्दू नाम वालों पर था  मगर अब इस मामले पर सभी की खामोशी को क्या कहा जाये,क्योंकि पिछली घटना में मुस्लिम समुदाय के द्वारा खुद ही आरोपियों को फांसी देने की मांग हो रही थी गुस्सा इस हद तक था कि मंदसौर के मुस्लिम समाज की तरफ से आरोपियों को कब्रिस्तान में जगह देने से इंकार कर दिया गया था पर अब देखने वाली बात ये है कि उसी मन्दसौर का बहुसंख्यक समुदाय इस मसले पर चुप्पी साध कर बैठा है

सोचिए हमारी सोच को किस हद तक लकवा मार गया है अब बलात्कार जैसे संगीन अपराध पर भी जात धर्म दल देखकर विरोध किया जाता  है !

इस नफरत के इस दौर में अब लोग सिर्फ सियासत ही जात धर्म के नाम पर नहीं कर रहे बल्कि हमें इस नफरत की इस हद तक आदत हो चली है कि अब अगर किसी मासूम का बलात्कार भी होता है तो हम सबसे पहले पीड़ित की जात और उसका धर्म खोजते हैं और फिर सत्ताधारी दल देखते हैं और न्याय के बड़े बड़े पैरोकार उसी के अनुसार तय करते हैं कि कब विरोध करना है और कब खामोश बैठना है

सियासत हो या फिर सामाज से जुड़ा कोई मसला जब तक जात धर्म से ऊपर उठकर फैसला नहीं होगा तब तक ऐसे ही सैकड़ो कालूराम जैसे वहशी दरिंदे बेख़ौफ़ होकर आजाद घूमते रहेंगे और हजारों की तादाद में आसिफा की इज्जत यूँ ही लूटी जाती रहेगी,और हम भी कुछ दिन का हाय हल्ला मचाकर फिर हर बार की तरह शांत बैठ जायेंगे,और अगर कोई वहशी दरिंदा पकड़ा भी जायेगा तो सरकारी गुंडे धरना देंगे और उसकी इज्जत पर अपने काले कोट की वकालत को हावी करेंगे,कठुआ हो या उन्नाव, निर्भया हो या फिर मंदसौर की बेटियां,जब तक हम हर बेटी को हमारी बेटी नहीं मानेंगे हर महिला का सम्मान नहीं करेंगे तब तक इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आने वाला

भीड़ बनकर बेकसूरों को मरने वाले लोग इस तरह की शर्मनाक घटनाओं पर कभी इन्साफ करते नज़र क्यों नहीं आते ? दरअसल वो भीड़ जो कभी भी कहीं भी किसी बेक़सूर को मौत के घाट उतार देती है इस कालूराम जैसे वहशी लोग ही उस भीड़ का हिस्सा होते हैं।

मंदसौर के जिंदादिल को  खुद आगे आकर इस जुल्म के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए और थानों का घेराव कर पुलिस और सरकार को दोषी के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने को मजबूर कर देना चाहिए,आखिर कब तक इस देश की बेटियों की यूँ ही अस्मत रेजी होती रहेगी

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाले सियासतदानों आखिर कब तुम्हारी जंग लगी जहनियत में यह बात आयेगी कि जब तक इस तरह की घटनाओ पर जब तक फाँसी जैसी सख्त सजा नहीं होगी इस देश की बेटियां ना बच पायेंगी और ना ही पढ़ पायेंगी,अपनी रैलियों में भीड़ जुटाने में और वोट के लिए पैसा बँटवाने के बजाए अगर वही पैसा महिला शशक्तीकरण पर लगाओगे तो वोट भी मिलेगा और इज्जत भी हाँ पर उससे तुम्हे मनमानी करने की छूट नहीं मिलेगी, हमारे नेता तो रैलियों में मस्त हैं इंसाफ और इंसानियत का गला घोटा जा रहा है किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता

मजलूम की आह बेकार नहीं जाती है यह हमारा यकीन है इंशाअल्लाह एक दिन ये तुम्हारी खामोशी जबानी लकवे में बदलकर हमेशा खामोश रहने की आदत बनेगी और लुटती इज्जतों मरती इंसानियत का तमाशा देखने वालों अल्लाह के यहां तुम्हारी पकड़ होगी,तब न सरकार न संगठन न संघ न पदवी न नेता न पुलिस कोई काम न आयेगा,

वहां फैसला होगा फैसला….

बेटियां रहमत होती हैं यह बात जितनी जल्दी समझ लो बेहतर होगा वरना वो दिन दूर नहीं जब तुम मौत की खुराक बनोगे।

 

लेखक- चौधरी सखावत

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