सत्ताधरी दल की कठपुतली बन बैठे हैं कन्हैया कुमार ?

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कन्हैया कुमार के फेसबुक पेज से

देश के इस चुनावी समर में अगर जिस लोकसभा सीट की सबसे ज्यादा चर्चा है वो बेगूसराय है जहाँ से JNU के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं,बेगुसराय से चुनाव लड़ना पूरी तरह से उनका संवैधानिक अधिकार है उनकी जगह अगर कोई और भी बेगुसराय से ही लड़ना चाहे तो लड़ सकता है हमारा संविधान इसकी पूरी इजाजत देता है ,मैं तो कहता हूँ कन्हैया को भी राहुल और मोदी की तरह ही दो जगहों से चुनाव लड़ना चाहिए था इसमें बिलकुल भी कोई बुराई नहीं है ।

पर कन्हैया कुमार ने जैसे खुदको और इस चुना पेश किया वो जरूर सोचने वाली बात है, क्योंकि कन्हैया कुमार कहते हैं बेगुसराय में लड़ाई उनके और भाजपा के मौजूदा सांसद गिरराज सिंह के बीच है,जो कि सरासर ग़लत बात है, सच तो ये है गठबंधन तय हो जाने के बाद बेगुसराय में कन्हैया की स्थिति खरपतवार की तरह हो गयी,और इसीलिए गठबंधन ने  कन्हैया की जगह तनवीर हसन को टिकट दिया जो कि जाईज बात भी है,कि वहाँ से तनवीर हसन को ही टिकट मिले जहाँ से वे बिना गठबंधन के मोदी लहर के दौर में भी दूसरे नंबर के प्रत्याशी रहे,पर तनवीर हसन जो हर लिहाज से कन्हैया और गिरराज सिंह पर भरी हैं उनको गोदी मीडिया के प्रोपगंडा में फँसा कर पूरी तरह से सीन से गायब करने की कोशिश की जा रही है जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक बात है ।

तनवीर हसन की पहचान सिर्फ इतनी नहीं है कि वे एक “मुस्लिम नेता” हैं या फिर रजद के प्रत्याशी भर हैं,वे एक पूर्णरूप से प्रभावी नेता हैं और कन्हैया कुमार से कहीं ज्यादा काबिलियत और तर्जुबा रखते हैं, मैं ये नहीं कहता कि तनवीर हसन ही बेगुसराय से आखिरी ऑप्सन थे पर मैं ये जरूर कहता हूँ वे बेहतर ऑप्सन हैं इस लोकसभा सीट के लिए जहाँ वे आसानी से भाजपा प्रत्त्याशी गिरराज सिंह को हरा सकते हैं ।

अगर देखा जाए तो यहाँ कन्हैया कुमार ने परोक्ष रूप से माइनॉरिटी का एक प्रतिनिधि कम करने की कोशिश की है,कन्हैया राजनीति में नये जरूर हैं पर उन्हें राजनीति में संख्याबल का ज्ञान नहीं होगा ये जरा कम समझ में आने वाली बात है मुझे पूरी उम्मीद है कि कन्हैया को वो चैप्टर जब एक ही वोट से अटल बिहारी वाजपेई की सरकार गिर गई थी जेएनयू जैसे देश के सर्वोच्च शिक्षण संस्थान में जरूर पढ़ने और समझने को मिला होगा जिसके कि वे छात्रसभा अध्यक्ष भी रहे हैं ।

इस देश में सबसे बड़ा वर्ग युवावर्ग है और उसकी राजनीति में सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है,और कन्हैया कुमार जैसे युवाओं का बिलकुल स्वागत होना चाहिए पर क्या हमें उन युवाओं की राजनैतिक समझ को परखने की जरूरत नहीं है? नरेंद्र मोदी की मुखरता से आलोचना करने वाले और उनके समर्थकों को अंधभक्त कहकर संबोधित करने वाले कन्हैया कुमार उनके साथी और उनके समर्थकों ने तो हु ब हू नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों के जैसी भाषा उनका ही रवैया अपना लिया है ! नरेंद्र मोदी की आलोचना तो आप प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद नहीं कर पा रहे थे क्योंकि तब उनके लिए सैंकड़ों करोड़ खर्च कर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी ने बकायदा ट्रोलरों की एक पूरी फौज आई टी सेल के रूप में खड़ी कर दी,पर कन्हैया ने ये काम भी बिना हींग फिटकरी का खर्च किये बेगुसराय में अपने ही समर्थन वाले गठबंधन के खिलाफ मैदान में उतरकर फ्री में ही कर लिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र भी हैं, ये भी इतिहास में दर्ज होगा कैसे एक जनसमर्थन को अपने हित में इस्तेमाल कर अपनी चालाकियों को अपनी वाकपटुता से ढाँका जा सकता है ।

कुल मिलाकर अगर देखा जाये तो परोक्ष रूप से गठबंधन का नुक़सान कर कन्हैया कुमार ने अप्रत्याक्ष रूप से मोदी सरकार की मदद करने की है क्योंकि जब वोट गठबंधन प्रत्त्याशी तनवीर हसन और कन्हैया कुमार के बीच बँटेगा जो कि तय है तब उसका फायदा गिरराज सिंह को “मिल सकता है” और कन्हैया कुमार जिस तरह से मीडिया में प्रोजेक्ट किये जा रहे हैं वो भी एक उदाहरण की वे सत्ताधारी दल को रास आ रहे हैं, क्योंकि आपको हर तरफ “गोदी मीडिया में” कन्हैया Vs गिरराज सिंह नजर आ रहा है तनवीर हसन जैसे मजबूत प्रत्याशी की भरपूर उपेक्षा की जा रही है और खुद प्रधानमंत्री हाल ही में टुकड़े टुकड़े गैंग जनता को चुनावी मंच से याद दिलाते नज़र आये हैं ।

लेख़क- सैय्यद असलम अहमद

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