वक़्त के साथ मुश्किल होता रास्ता

कन्हैया कुमार की मुश्किलें अब बढ़ती नजर आ रही हैं उनके लिए रास्ता मुश्किल होता जा रहा है,चुनाव पूर्व जहाँ कन्हैया को जो अपार जनसमर्थन हासिल था वो अब उनके साथियों और समर्थकों की गलतियों के चलते  दरकता नजर आ रहा है,अब तक जो भी लोग उनके समर्थन में प्रचार करने पोंहचे उनमें जिग्नेश,शेहला,जावेद अख्तर,फातिमा नफीस ही ज्यादा चर्चाओं में रहे हैं और इनमें भी अगर फातिमा नफीस को अलग कर दिया जाये तो बाकी के तीन नाम जाने अनजाने कन्हैया कुमार का फायदा कम नुक़सान ज्यादा करते नजर आये हैं ।

 

फिलहाल शायर जावेद अख्तर चर्चाओं में हैं अपनी विवादित टिप्पणी को लेकर ,लगता है जावेद अख्तर साहब बोलते वक्त भूल गये कि कन्हैया कुमार को सिर्फ शहर का वोट नहीं जिता सकता जीतने के लिए उन्हें गाँवों के वोटों की भी सख्त जरूरत होगी,व्यंग्य के रूप में कही गयी उनकी बात का जो ऊपरी अर्थ निकलता है उस से कन्हैया गिरराज सिंह के मुकाबले तनवीर हसन के विरोधी ज्यादा नजर आते हैं,बिना नाम लिए उन्होंने कहा “कन्हैया को वोट ना देने वाले लोगों को चाहिए वे तनवीर को वोट ना देकर गिरराज को वोट दें कमसे कम वो अहसान तो मानेंगे” तनवीर हसन 2014 के चुनाव  में रजद टिकट पर चुनाव लड़कर भी साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा वोट पाकर मजबूती से मोदी को सीधी चुनौती देते नजर आये थे,और ऐसा कुछ ही गिनी चुनी सीटों पर हुआ था जो ये साबित करता है कि तीन बार MLC रहे तनवीर हसन एक सेक्यूलर और जमीनी नेता हैं जनता पर उनकी पकड़ काफी मजबूत है पर जावेद अख्तर अपनी बातों से उन्हें सिर्फ और सिर्फ मुसलमानो का नेता साबित करने की कोशिश कर गए।

शायर जावेद अख्तर

मौजूदा वक्त में भी तनवीर हसन बेगुसराय में सबसे मजबूत कैंडीडेट नजर आ रहे हैं क्योंकि पिछली बार जिस प्रतिद्वंद्वी भोला सिंह ने उन्हें हराया था उनके स्थान पर भारतीय जनता पार्टी ने अपने विवादास्पद नेता गिरिराज सिंह को उतारा है,जिन्हें हराना तनवीर हसन के लिए आसान होता अगर कन्हैया यहाँ से चुनाव ना लड़ रहे होते क्योंकि पिछली बार वे सिर्फ रजद के प्रत्याशी थे अब गठबंधन के हैं जिसमें बिहार की कई महत्वपूर्ण पार्टियां भी शामिल हैं ।

कन्हैया कुमार एक अच्छे और प्रभावी वाक्ता हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं पर जिस ढंग से उनके साथी अपने बयानों से उन्हें कमजोर करने का काम कर रहे हैं जो उन्हें सत्ता की दौड़ से बहार कर सकता है,गिरराज सिंह कट्टर और विवादास्पद होने के साथ साथ बेगुसराय के लिए बहारी नेता भी हैं कन्हैया कुमार शुरू से ही उनको और नरेंद्र मोदी को चुनौती देते नजर आ रहे थे जो कि उनकी पहचान भी रही है ,पर जावेद अख्तर ने एक विवादित टिप्पणी कर उनकी सारी मेहनत पर पानी फेरने का काम किया है,वहीं दूसरी ओर शेहला राशिद भी जावेद अख्तर की राह चलकर धर्म को टारगेट करने की रणनीति को आगे बढ़ाती नजर आयीं अपने भाषण में वे कहती हैं,धर्म बचाने का ठेका गरीबों ने नहीं ले रखा शहरों के अमीर हिन्दू बीफ खाते हैं और शहरों के अमीर मुसलमान शराब का लुत्फ लेते हैं गाँव के गरीब धर्म बचाते रह जाते हैं ।

शेहला अभी नयी नयी राजनीति में आई हैं शायद इसीलिए उन्हें ये मालूम नहीं कि भारत की राजनीति भावनाओं से जुड़ी हुई है धर्म की जिसमें महात्वपूर्ण भूमिका है और कन्हैया कुमार पर पहले ही देशद्रोह का इलजाम लग चुका है जो कि एक अलग भावनात्मक मुद्दा है जिसे भाजपा लगातार भुनाने की कोशिश करती आई है,आज भी उनके प्रवक्ताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक उनके खिलाफ “टुकड़े टुकड़े गैंग” शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं और अब उनके द्वारा धर्म को टारगेट करने से इसका खामियाजा कन्हैया को भुगतना पड़ सकता है ।

अभी तक कन्हैया कुमार द्वारा कोई गलती ना किये जाने का ही नतीजा है कि इतनी मुश्किलों के बावजूद भी वे मजबूती से अपनी बात रख पा रहे थे और बेगुसराय के बेटे के तौर पर खुदको पेश कर रहे थे,पर पता नहीं उनकी पार्टी को उन्हें राष्ट्रीय स्तर का नेता साबित करने की हड़बड़ी है या फिर उनके साथी सालों बाद उभरे एक नेता को कैसे पेश करना है ये समझ नहीं पा रहे हैं जिसके चलते वे ये गलतियां कर रहे हैं

अमित सिंह की धमकी भरी पोस्ट

कन्हैया के समर्थक तो उनके साथियों से भी एक कदम आगे निकलकर कन्हैया को वोट ना देने पर बेगुनाहों की लिंचिंग को समर्थन देने को तय्यार नजर आ रहे हैं सोशल मीडिया पर लिखकर वे कन्हैया के हारने पर मुसलमानों को सीधी धमकी देते नजर आ रहे हैं,अब ये देखने वाली बात यह होगी अपनों द्वारा पैदा की जा रही इन तमाम मुश्किलों से कन्हैया कुमार कैसे पार पाते हैं ।

सैय्यद असलम अहमद

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