मेरी मर्जी

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“ये बहुत असभ्य है” यानी कुछ गलत है यानी कुछ ऐसा हुआ है की किसी के लिए तो गलत हो रहा है,यानी कुछ ऐसा है जो “समाज” को पसंद नही है,अच्छा ये समाज क्या और केसे है ये बाद में वक़्त निकालकर शायद तय हो जाएँ लेकिन हाँ गलत है,यानी किन्ही दो नौजवानों का ट्रैफिक पुलिस से बच कर निकलना असभ्य है लेकिन सही है क्यूँ चल रहा है लेकिन केसे और क्यों?

कुछ,मिसाल के तौर पर किसी चोराहें पर सिगरेट पीता युवक असभ्य है लेकिन एक दायरे के लिए ही तो है,उसके लिए वो उसकी “फ्रीडम” है तो केसे आप उसे असभ्य केसे कह सकतें है? कह ही नही सकतें है क्यूंकि सवाली ही नही उठता है,लेकिन जब उठता है तो फिर? क्या करें? तो एक ऐसा कानून या दायरा तय हो जाएँ जहाँ सब एडजस्ट हो सकें,क्या इसा मुमकिन है ?

मान लो कुछ गलत,कुछ अटपटा कुछ असभ्य हो रहा है तो उससे निगाहें नीची रख कर लीजिये,यदि ऐसा हो जाएँ तो आधे से ज्यादा दिक्कत खत्म जाएँ,मगर ऐसा होना इतना आसान है नही,मिसाल के तौर पर मै आपको बहुत आसान मिसाल देता हूँ की किसी मेट्रो सिटी के किसी बड़े कॉलेज के एक जोड़े को देखिये यानी युवक और युवती,जो की आराम से आपको किसी करते गले मिलते या फिर हाथ में हाथ डालें मिल जायेंगे |

क्यूंकि ये सब “मोडर्न” होने का हिस्सा है,अच्छा अब उस तबके के किसी एक को वहां भेजिए जिसे ये असभ्य लगा हो की इनसे पूछिए की ऐसा क्यों कर रहें है ये तो असभ्य है ? तो उन्हें वहां से आपको जवाब मिलेगा की “अरे हमारी मर्ज़ी जो चाहें करें” खैर वो सवाल पूछने वाला तो खैर झेंप जाएँ लेकिन दिक्कत सामने निकल कर सामने आ जाती है |

इस बात में जो चीज़ सामने आएगी वो है “मर्ज़ी”,लेकिन ये मर्जी तो हर एक चीज़ को तार तार कर देगी,यानी जब बाहर में खुले में और आज़ादी से सब कुछ ‘मर्ज़ी के नाम पर हो सकता है तो क्या हम और मर्जी करने वालों को रोक पाएंगे? एक बहुत दुखदायी मिसाल,बलात्कार करने वाले गुनहगार अगर कहें की “ये तो मेरी मर्जी है” तो हम कहाँ मुंह छुपायेंगे ? अच्छा इससे पहले आप कानून की आड़ लेने वालें है तो बता दूँ की पब्लिक प्लेस में ऐसा कुछ करना “सभ्य” है जो गगलों में हाथ डालना या किस करना है ? क्या यह कानूनन सही है क्या तो आप मुझे ही “असभ्य” बात देंगे,लेकिन बात में थोडा ही सही दम तो है ही न |

असल दिक्कत है चोइस यानी “मर्जी” वेसी ही मर्जी जो हमारे सेंसर बोर्ड की कभी भी चल जाती है की ये जो सीन है “असभ्य” है,अच्छा गूगल पर एक सेकेंड के भी बहुत कम हिस्से में जो हम लाखों के तादाद में “असभ्य फ़िल्में” देख लेतें है उस बात का न तो सरकार को और न ही किसी भी सेंसर को होना “असभ्य” लगता है और न ही उस पर कुछ “सेंसर” लगता है पता है क्यों क्यूंकि “मर्ज़ी” है,अरे साहब केसी मर्ज़ी है क्या सभ्य और असभ्य होने के पैमाने हम “मर्ज़ी” पर तय कर सकतें है? और अगर तय कर सकतें है तो और भी बहुत कुछ करिए यां यूँ कहूँ कुछ भी करिए ?लेकिन यहाँ दूसरा अध्याय है की मेरी आज़ादी है तो आप को क्या ? मगर आपकी आज़ादी से मेरी आज़ादी भंग हो रही है तो आपको क्या?

अब इस स्थिति पर सिर्फ एक ही चीज़ थक हार के सामने आती है की “कोमन कानून” अब ये भी केसे हो “बाबुमोशाय बन्दूक्बाज़” आपको अच्छी लगें या नही,मुझे नही लगती लेकिन एक कानून होगा तो शायद बेहतरी होगी,की गलत तो गलत ही है,इसमें “मर्ज़ी” नहीं आएगी,हाँ हल या निष्कर्ष क्या होगा ये “सभ्य” लोग बेठ कर बात करके तय करेंगे,लेकिन फिलहाल “मेरी मर्ज़ी” नुक्सान पहुंचा रही है |

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