गूगल फोबिया

मैं 10 साल का था तब मुझे गली के आवारा कुत्ते ने पैरों में काट लिया। मैं जैसे तैसे उससे बचा वर्ना कमबख्त पता नही मेरा क्या हाल करता, शायद वह खुद को शेर समझ रहा था और मुझे शिकार।

मेरी मरहम पट्टी करवाई गई, टिटेनस का टीका लगाया गया और शाम को मैं निश्चिंत होकर अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था, बिस्तर गुदड़ी वाला था, मतलब वह बिस्तर जिसे पुराने कपड़ों को खोल में डालकर गांवों में बनाया जाता है, बिजली अक़्सर बंद रहती थी इसलिए चिमनी की पीली रोशनी थी हमारे कच्चे घर में, मेरे पास में मेरी माँ बैठी थी और उनके पास हमारे पड़ोस की एक महिला आकर बैठी थी जिन्हें हम सब काकी कहते थे, उनके साये मेरे ऊपर अंधेरा कर रहे थे शायद मुझे नींद आजाए इसलिए वह ऐसे बैठी थी। उन्होंने मेरे हालचाल जानने के लिए पूछा कि कैसे काट लिया कुत्ते ने और फिर उन्होंने कुत्तों को भयंकर रूप से बुरा भला कहा, उसके बाद शुरू हुआ रैबीज के घातक लक्षणों पर डिस्कशन। अरे लाडी (मेरी माँ को वे इसी संबोधन से पुकारती थी) मेरे भाई को भी कुत्ते ने काट लिया था तेरह साल पहले, हम पहले तो यही समझे कि सही (नार्मल) कुत्ता होगा लेकिन वह तो पागल था, मर गया था कुत्ता कुछ दिन बाद, फिर मेरे भाई को हड़किया (गांव की मालवीय भाषा में रैबीज) के लक्षण आये, वह सभी को काटने को दौड़ने लगा, पानी से डरने लगा, कुत्ते की तरह भौकने लगा…आदि आदि और अंत में उन्होंने बताया कि उनके भाई को डॉक्टरों ने जहर का इंजेक्शन देकर मारा (जो मैंने सुना वह बता रहा हूँ, जबकि ऐसा संभव नहीं है)…

उनकी बातों ने मेरे दिल की धड़कने खतरे के निशान से ऊपर तक बढ़ा दी और मुझे घबराहट होने लगी, मेरे लिए वह रात सबसे भयानक रात साबित हुई सबसे डरावनी…सबसे कुत्ती रात। मैं रातभर कुत्ते की लंबी उम्र की दुआ मांगता रहा, अगर वह मर जाता तो मेरा भी पत्ता कटने के चांस बढ़ जाते…मुझे पहली बार जादूगर की कहानी सच लगने लगी कि किसी जानवर के अंदर किसी इंसान की जान हो सकती है।

खैर वह कुत्ता नही मरा (कई दिनों तक मैंने उसपर नज़र रखी थी) और मुझे यकीन हो गया कि वह पागल नही था और मुझे रैबीज नही होगा। लेकिन लगभग 10 से 12 दिन तक मेरा जीवन नर्क हो गया था।

मैं यह कहानी इसलिए सुना रहा हूँ कि आजकल उन नर्मदा काकी की जगह ले ली है “#गूगल_काका” ने। आपको कोई स्वास्थ्य समस्या होती है और वह आपको लक्षण बताना शुरू कर देता है। आप एसिडिटी की समस्या बताते हैं और वह अलसर से लेकर कैंसर तक से पीड़ित बता देता है, आप खांसी की जानकारी मांगते हैं और वह सीधे टीबी बता देता है, आप सर दर्द की जानकारी चाहते हैं और वह ब्रेन ट्यूमर पर लेजाकर छोड़ देता है, आप पेशाब में जलन के बारे में जानकारी चाहते हैं और वह HIV या मूत्रतंत्र के कैंसर पर लेजाकर छोड़ देता है… आदि आदि…और फिर शुरू होता है ख़ौफ़ का दौर…

इस गूगल काका से यह मासूम लोग डरने लगते हैं, फोबीया हो जाता है, डर का सैलाब उमड़ पड़ता है और जीना मुश्किल हो जाता है और ये लोग डॉक्टरों के पास जाने से डरने लगते हैं कि कहीं गूगल काका सच साबित न हो जाए।

मेरी ईमानदार सलाह यह है कि गूगल काका या काकी को छोड़ो और डॉक्टर अंकल से नाता जोड़ो…देखो उसके पास आप जैसे ही मरीज़ आते हैं जो जानता है कि आपकी वास्तविक समस्या क्या है और वह आपको सही सलाह दे सकता है, जिसकी आपको ज़रूरत है और जिसके आप हक़दार हैं…

लेखक
डॉ अबरार मुल्तानी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *