खुली आंखों पर चढ़ी परत सा है आतंकवाद ।

आतंकवाद को अगर पूरी तौर पर ताकतवर मुल्कों की देन कहा जाये तो अतिश्योक्ती नहीं होगी ! जिस आतंकवाद को एक धर्म विषेश के साथ जोड़ा जाता है ये उस नीति का एक हिस्सा भर है जो पॉवर(तेल) से जुड़ा है ।

विश्वशांति की बात करने वाले ही घातक हथियारों के सौदागर हमेशा से रहे हैं इतिहास इस बात का गवाह है ! और ये भी एक सच है कि जब जब शांति सुरक्षा के नाम पर ताकतवर बनने की होड़ शुरू हुई है हमेशा सिर्फ रक्तपात हुआ है ।

आदिम युग से लेकर आधुनिक युग तक इंसान शक्ति का पुजारी रहा है और शक्ति की जरूरत तब ज्यादा मेहसूस होती है जब इंसान डरा हुआ हो ! इसी बात का फायदा उठाने के लिए कथित दुनिया के चौधरी और इसके अभिन्न मित्र देशों ने मिलजुल कर आतंकवाद के खेल की शुरूआत की हालांकि इसके नाम पर किसी ही एक देश से ज्यादा कमाई नहीं हो सकती थी इस सच को मद्देनजर रख कर स्वयम् पोषित आकंवादियों को जगह जगह पोंहचाया गया ।

हाँ ये वे भूल गये थे जिस विनाशकारी चीज का निर्माण हम फायदे के लिए करते हैं कभी कभी हमें उसका नुकसान भी उठाना पड़ता है नतीजतन ट्विन टावर जैसी घटनायें,अब ये कितनी हुयीं ये हम और आप भी अच्छी तरह जानते हैं,और ये जब भी हुयी हैं ताकतवर मुल्कों को वक्ती नुकसान निकालकर हमेशा लाभकारी ही साबित हुआ है, इस जोड़ तोड़ के सहारे ही इन मुल्कों की चौधराहट आज भी कायम है ।

किसी भी मुल्क में शांति की स्थापना के नाम पर तबाही मचाकर उसके अहम ठिकानो पर कब्जा करने के लिए पहले उस मुल्क में आशांती होना जरूरी है, मिसाल के तौर पर “रासायनिक हथियारों” के नाम पर इराक के क्या हालात बना दिये गये ये भी किसी से छिपा नहीं है और कितने रासायनिक हथियार मिले हैं इसका आज तक किसी को पता नहीं आखिर क्यों?।

देखा जाये तो अब तक आतंकवाद शुद्ध रूप से एक पोलिटिकल टूल ही साबित होता है, हालांकि कभी कभी अपवाद स्वरूप कुछ घटनाओं का होना हथियारों के सौदागरों ोो  के लिए फायदेमंद ही साबित होता है, इससे धर्म विशेष को टारगेट करने में मदद ही करता है ! इराक से लेकर सीरिया तक सिर्फ और सिर्फ शुद्ध नफा कमाया जा रहा है इंसानी लाशों के ढेर लगाकर और इसका जिम्मेदार कोई धर्म  नहीं पर हाँ इस बात का खास ख्याल रख कोशिश की जाती है कि के जिम्मेदार एक धर्म विशेष ही नजर आये जिससे नफरत बढ़े और व्यपार भी ।

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