कश्मीरी पंडितों के लिए विषेश रोजगार पैकेज को दी गयी चुनौती की जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने किया खारिज !

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पुलवामा हमले के बाद चल रही सियासी उठा पटक के बीच जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने ये फैसला देकर भाजपा सरकार को अपनी पीठ थप थपाने का एक मौका दे दिया !

घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए सरकार द्वारा की गयी विशेष रोजगार पैकेज की घोषणा को कश्मीरी सिखों की संस्था,”कश्मीरी सिख समुदाय” और दो कश्मीरी बेरोजगार युवाओं ने हाईकोर्ट में अर्जी देकर ये माँग की थी कि उन्हें भी कश्मीरी पंडितों के समकक्ष माना जाये, कश्मीरी पंडितों की वापसी और उनके पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री के पैकेज की घोषणा के बाद उन्होंने ये अपील की थी ।

इनका कहना था कि घाटी में रह रहे सिखों को कश्मीरी पंडितों से अलग मानने से समानता के प्रावधान का उल्लंघन हुआ है, जम्मू कश्मीर प्रवासी (विशेष अभियान) भर्ती नियम 2009 को संशोधित कर कश्मीरी पंडितों के लिए ये प्रावधान किया गया है !

न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने कहा कि संशोधन के कारण कश्मीरी पंडितों का एक ऐसा वर्ग तय्यार हो गया है जो 1 नवंबर 1989 के बाद से ही कश्मीर घाटी के बाहर प्रवासन के लिए नहीं नहीं गये, साथ ही इस वर्गीकरण को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि आलोच्य SRO के तहत जिस वर्ग की पहचान की गयी है वो कश्मीरी पंडितों का एक ऐसा वर्ग है जो घाटी में गड़बड़ी के बाद बाहर नहीं गया, प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी वहीं रहा !

इस समुदाय की लगातार मांग के बाद ये वर्गीकरण किया गया है क्योंकि ये लोग घाटी में काफी बुरे हाल में रह रहे थे,भारत सरकार ने इस बात पर भी गौर किया कि ये मुठ्ठी भर लोग अपनी आर्थिक दुर्दशा और अपने पड़ोसियों द्वारा दी गई सुरक्षा की गारंटी के कारण घाटी के बाहर नहीं गये,वे घाटी में ही रहे और अपने हालात से जूझते रहे जिसके कारण उनकी पारिवारिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ।

कोर्ट ने कहा कश्मीरी सिख समुदाय की स्तिथि कश्मीरी पंडितों के जैसी नहीं है,साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि नियमों में जो संशोधन हुआ है वो उन कश्मीरी पंडितों की स्थिति को बेहतर करने के लिए हुआ है जिन्होंने 1989-1990 के दौरान विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी घाटी में रहना ही बेहतर समझा,जबकि उनके समुदाय को लक्ष्य कर मारने की कार्यवाही से उनके मन में असुरक्षा और भय व्याप्त हो गया फिर भी वे अपनी जान की कीमत पर घाटी में रह रहे थे,ये असुरक्षा की भावना हर ओर थी फिर भी कुछ परिवार ऐसे थे जो या तो भारी गरीबी में जी रहे थे या उनके पास संसाधन नहीं थे जो वे घाटी छोड़कर बाहर जा सकें या फिर उनके पड़ोसियों ने सुरक्षित रखने का आश्वासन दिया कारण चाहे जो भी रहे हों वे घाटी से बाहर नहीं गये और घाटी में हालात खराब होने पर उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा ।

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