ईद परदेश में !

 

 

ये पहली ईद नहीं है जो अपने घर और घरवालों से दूर गुजरेगी ! शुरू में एक दो ईद अजीब लगीं फिर आदत हो गयी या यूँ कहा जाये कि सब्र आ गया! एक लंबा वक्त गुज़ारा है इस शहर में इस शहर की गलियों में और यहाँ के लोगों की सोहबत में! ये अपना घर तो नहीं है पर अब काफी हद तक घर जैसा ही एहसास देता है!

लोग ईद के दिन काफी इमोशनल हो जाते और उनकी पोस्ट भी बिल्कुल सैड सी होती हैं! मुझे नहीं लगता उन्हें सैड होना चाहिए! माना घर से दूर हैं पर बहुत ज़्यादा तो नही! सिर्फ आठ से दस घंटे की दूरी मायने नहीं रखती! फिर इस आधुनिकता के दौर में जहां फ्री में सबसे वीडियो चैट हो जाए तो दूरी का एहसास काफी कम हो जाता है!

सब मिलाकर जो हासिल है उनमें खुशियां तलाशो! कई साल से ईद का दिन घर से दूर गुजारने के बाद भी काफी सुकून भरा दिन होता है “नींद” जो मुझे अब सबसे प्यारी है जम के लेते हैं! दिन की शदीद गर्मी सो के गुज़रे तो ठंडी रात अपनी होती है! बहुत सी मुलाकातें, मोहब्बतें बहुत सा अपनेपन का एहसास लिए हर मोड़ पर कोई ना कोई जानने वाला मिल ही जाता है!

हमेशा साये की तरह साथ रहने वाले कुछ अज़ीज़ दोस्त हाल ही में घर को चले गए हैं उनकी गैर मौजूदगी का एहसास तो होना ही है,जिनकी शॉपिंग के दौरान घंटों मार्केट में फिरने के बाद भी अपने लिए महज़ दो कैप और एक रुमाल ले पाया हूँ! कपड़े लेने का शुरू से ही मूड नहीं था और ना ही लिया! कल का दिन ईद की नमाज़ के बाद सोने में और पिछली रातों की तरह आगे की तमाम रातें हुक्के में कट जाएंगी!

घर में अब्बू से मेरी कम गुफ़्तगू होती है पता नहीं शुरू से ही डर बसा है या एहतेराम है जो भी है वो आज तक समझ नहीं आया! पर ईद के दिन अब्बू पूरी नज़र रखते हैं कि मैंने नमाज़ पढ़ी या नहीं पढ़ी! ज़्यादातर उनकी कोशिश यही होती है कि अपने साथ बिठा सकें! और हम अलग बैठने की फिराक में होते हैं!

नमाज़ ख़त्म होते ही फिर अब्बू से गले मिलते हैं अब्बू भी कोशिश में रहते हैं कि सबसे पहले हमसे ही गले मिलें! इस लिए वो खुद ही मेरी तरफ बढ़े चले आते हैं! दो साल पहले लगातार चार साल के फासले पर ईद की नमाज़ एक साथ पढ़ी थी! अब्बू दुआ ख़त्म होते ही मेरी तरफ सबकी नज़र से बचते हुए चले आये थे कि हमसे गले मिलेंगे उनकी ये बात मैंने नोटिस की थी !

यहाँ दुआ ख़त्म होने के बाद जब लोग उठ के खड़े होते हैं और अपने अहबाबों के गले लगते हैं तब पलभर के लिए निगाहें अब्बू को ढूंढती हैं कि अभी वो भीड़ से निकलते हुए मेरे पास चले आएंगे! बस वही एक लम्हा होता है जो दिल पर भारी पड़ता है! वही खूबसूरत मंज़र घर और अब्बू से दूरी का एहसास कराता है! इंशाअल्ल्लाह सुबह अब्बू को ईद की मुबारकबाद देनी है! और अगली ईद पर साथ रहने का वादा करना है इंशालल्लाह”

बाकी मस्जिद ए नबवी में लगातार सातवीं बार ईद की नमाज़ की अदायगी और सातवां मुक़म्मल रमज़ान मदीने में खुशनसीबी है ।

खान बिलाल

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