आरक्षण की आड़ में।

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हमारे देश में जिनकी शिक्षा तक पहुंच नहीं है वह तो नहीं ही पढ़ पाते हैं जिनकी शिक्षा तक पहुंच है भी वह भी पढ़ना या जाना नहीं चाहते। यही वजह है कि पूरी जनता को नेता दशकों से बेवकूफ बनाते आ रहे हैं और हम बेवकूफ बनते आ रहे हैं।

चुनावी साल में गरीब सवर्णों के लिए 10% आरक्षण बेवकूफ बनाने की नई चाल है, क्योंकि सिर्फ सरकार के घोषणा कर देने से या बिल पारित करा लेने से, इनफेक्ट कानून बना देने से भी आरक्षण नहीं मिल जाएगा। पूर्व में नरसिम्हा राव की सरकार गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की कोशिश कर चुकी है किंतु उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहते हुए की आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं दिया जा सकता, इसे रद्द कर दिया गया था। सरकार यह जानती है कि पूर्व में ऐसा हो चुका है फिर भी इस बात की घोषणा सरकार के घाघपन को ही दर्शाती है

संसद में बहुमत में होते हुए भी आप सर्वोच्च नहीं हैं। इसके ऊपर एक गांव का चौधरी है, सर्वोच्च न्यायालय, जो आपके निर्णयों की समीक्षा कर सकता है;उसे अमान्य या मान्य घोषित कर सकता है। हां, यह बात जरूर है कि आप चुनावी भाषणों में यह कह कर कि, “हमने तो पूरी कोशिश की लेकिन न्यायालय द्वारा अमान्य करार देने से हम कुछ ना कर सके” आप वोट बटोर सकते हैं एवं न्यायालय को विलेन बना कर पेश कर सकते हैं। और तारीफ यह है कि जनता में से एक आवाज यह नहीं उठेगी कि, “चौकीदार साहब! जब आपको पता था आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता तो आपने किया ही क्यों ? आपने कोई और रास्ता क्यों नहीं ढूंढा गरीब सवर्णों के उत्थान के लिए।”

क्योंकि हम नहीं पढ़ते हैं भारत का संविधान और नहीं जानकारी रखते हैं न्यायालय के प्रमुख फैसलों की। हम वह लोग हैं जो सिर्फ सतह को देखते हैं सतह के नीचे स्तरों पर नहीं जाते। इसलिए हम में सवाल पूछने की कूवत नहीं है। हम बस शिकायत करते हैं कि नेता झूठे वादे करते हैं, जुमले फेंकते हैं और हमें बेवकूफ बनाते हैं। हम खुद से यह कभी नहीं पूछते की कोई हमें बेवकूफ कैसे बना सकता है अगर हम बेवकूफ ना बनना चाहे। हमारे बेवकूफ बनने के पीछे हमारी कम जानकारियों का होना है और कम जानकारियों का कारण हमारी जानने की इच्छा का ना होना है। हमारे अंदर यह इच्छा नहीं है कि अपने देश का इतिहास, भूगोल और राजव्यवस्था जाने। हमारा सिस्टम कैसे काम करता है,हमारा समाज कैसे सोचता है, हमारे नागरिकों का मनोविज्ञान क्या है,यह सब जानने की रत्ती भर भी चाह नहीं है। जिस वजह से की कोई भी हमारे सामने दो लाइन बोल देता है तो हमें लगता है कि वह कितना ज्ञानी है या कोई भी हमें कुछ भी बता कर उल्लू बना जाता है। इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं की पर डे के हिसाब से सबसे सस्ते रेट में 2GB डाटा हर रोज हमारे पास होता है लेकिन हम उसे खर्च करते हैं बेकार की चीजों में जबकि कई सारे ऐसे एप हैं जिस पर इन विषयों से जुड़ी किताबें मौजूद है हम थोड़ा-थोड़ा भी रोज पढ़ें तो चीजों के बारे में बेसिक नॉलेज ले सकते हैं और अगली बार जब हमें कोई मूर्ख बनाने की कोशिश करें तो सवाल कर सकते हैं। लेकिन अफसोस कि हमें विक्टिम बनने में बड़ा मजा आता है हमें आदत है खुद को विक्टिम बना कर दिखाने की। तो बनाते रहिए खुद को विक्टिम और नेता लोग हमें उल्लू बनाते रहेंगे।

पुन: – आर्थिक आधार पर आरक्षण एक बेहतर ऑप्शन है हालांकि आर्थिक व जातीय अवस्था दोनों ही को आधार बनाकर फिर आरक्षण देना ज्यादा बेहतर रहेगा वरना कोई भी कभी भी ना तो आठ लाख से ज्यादा कमाना चाहेगा, ना ही अपनी जातीय व्यवस्था को धता बताकर प्रगति कर आगे बढ़ना चाहेगा और आगे बढ़ भी गया तो बार-बार पीछे मुड़कर देखेगा, जो देश के नागरिक समाज के लिए अच्छा तो नहीं कहा जा सकता।

By

नेहा चौधरी

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