आजादी के सिपाही

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ऐसे थे वो..
कलकत्ता के निकट जगरगच्छा जेल में बंद उन 56 कैदियों को रोटी दी नही जातीं थी बल्कि कुत्ते बिल्लियों की तरह उनके सामने फैंकी जाती थी। एक दिन फिरंगी अधिकारी निरीक्षण पर आया तो वह उनकी बैरक तक भी पहुंचा। ‘औह…दीज आर दी ब्रेव इंडियन ?’ फिरंगी अधिकारी नें मुंह बनाते हुए पीछे खडे पिठ्ठुओं से पूछा। तो पीछे से आवाज आई ‘यस सर’। फिरंगी अफसर के दोनों हाथ बैरक के गेट में लगी लोहे की सलाखों पर थे। बैरक में बंद कैदी उसके ईरादों को भांप व समझ चुके थे। हूं..इंडियन ब्रेवज ? काना कैसा मिलते हैं ? फिरंगी का यह सवाल सुन कर खून खोल गया। उसने खडे होने का प्रयास किया , परन्तु साथी बडे अफसर ने हाथ दबा दिया। फिरंगी मानने वाला कहां था , उसने फिर कहा ‘एह..अमने पूचा , काना कैसा मिलते है ?’ उसका चेहरा लाल हो गया। खडा होने लगा तो उसी अफसर ने फिर हाथ दबाने का प्रयास किया , परन्तु इस बार उसने अपने अफसर के आदेश को भी मानने से इंकार कर दिया और खडा हो गया फिरंगी अधिकारी के सामने। फिरंगी अधिकारी का घमंड चूर चूर हो गया और उसका चेहरा , गुस्से में तमतमाने लगा। ‘बोलो..बोलो ..काना कैसा मिलते हैं ?’ फिरंगी अधिकारी ने जैसे ही यह सवाल सामने खडे उस नौजवान कैदी से किया तो उसने जोर से खखार कर फिरंगी अधिकारी के मुंह पे थूक दिया। दाड पीसते हुए कहा ‘काना ऐसे मिलते हैं।’
साथ मे कैद अधिकारी ने डांटते हुए जोर से कहा ‘ मंगल खान , यह ठीक नही किया। तुम कहीं भी मेवातीपन से बाज नही आते।’ मंगल खान , साहब की तरफ देख मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। बैरक में सभी कैदियों की चिंता स्वभाविक थी और बाहर ‘इंडियन ब्रेव’ की हरकत से हल्ला मच गया। तरह तरह की आवाजें आ रही थी ‘बाहर निकालो इन्हें’। ‘सबक सिखाओ इनको’ ‘इतना मारो कि भारत का नाम भी न ले पाएं’। उसके बाद जो हुआ उसे लिखने में मेरी उंगली कांप रही है। आंखें नम होने लगी हैं।

यह मंगल खान कोई ओर नही , हरियाणा के मेवात जिले के खंड नूंह के गांव खेडला में जन्मा भारत मां
का एक सच्चा सपूत था।
श्री मंगल खान मेवाती का जन्म 1-10-1898 को गांव के एक साधारण व गरीब से किसान नवाज खां के घर मे हुआ। 1924 मे वे ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए। बाद में बाबू सुभाष चन्द्र बोस के आह्वान पर ब्रिटिश सेना से बागी हो कर आजाद हिन्द फौज में चले गए। आजाद हिन्द फौज में , वे शाहनवाज बटालियन में सैकिंड लैफ्टिनेंट बने। जनरल शाह नवाज खान के नेतृत्व में उन्होनें रंगून , पोपाहिल , मेकटौला , नागा-साकी , इंडोग्राम , ब्रहमइंफाल जैसे असंख्य मोर्चों पर अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए। अदम्य साहस के बलबूते पर वे बाबू सुभाष चन्द्र बोस की निजि सीकरेट सर्विस के इंचार्ज बनाए गए।

लंबी लडाई के बाद बाबू जी के आदेश पर समूची आई० एन० ए० ने आत्म समर्पण कर दिया। 36 हजार की फौज में से 56 फौजियों की शनाख्त कर छांट लिया गया , जिन्हें कलकत्ता के निकट जगरगच्छा जैल में डाल दिया गया। जगरगच्छा जैल की यातनाओं के बाद फिर छटनी की गई तो 16 जांबाजों को दिल्ली लाकर , लाल किला में कैद कर दिया गया। जिनमें मुख्य तौर पर जनरल सहगल , जनरल शाहनवाज खान , कर्नल ढिल्लों , सैकिंड लेफ्टिनेंट मंगल खान आदि शामिल थे। इन 16 सपूतों पर फिरंगियों ने विभिन्न धाराओं मे मुकदमें दर्ज किए। जघन्य अपराधों में कथित रूप से लिप्त इन खूंखार ‘अपराधियों’ के केसों की सुनवाई के लिए लाल किला में ही ग्यारह जजों की बैंच वाली अदालत लगाई गई। लगभग तीन साल चले मुकदमों में विभिन्न सजाएं सुनाई गईं। अपीलें हुईं।
अंत में पंडित जवाहर लाल नेहरू नें ‘लाल किला ट्रायल’ में उक्त कथित अभियुक्तों की पैरवी की और ये वतन के सिपाही , भारत मां की स्वतंत्रता के साथ आजाद हो गए।
अपनी बकिया जिंदगी उसी खुद्दारी और सादगी से जीते हुए 19 सितंबर 1990 को इस दुनिया ए फानी से कूच कर गए।

लेखक
ऐडवोकेट नूरूद्दीन नूर पुत्र हैं इस महान स्वतंत्रता सेनानी स्व० चौधरी मंगल खान मेवाती के ।

 

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