सोचना हमें है डर कर शांत बैठ जाना है, ख़ेमा बदल लेना है, या फिर डरते हुए भी डर से आज़ादी के लिए लड़ना है ………

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कई राज्यों में विधानसभा चुनाव नज़दीक है. सत्ता पक्ष सरकार विधानसभा चुनाव कि तैयारियों में लग चुकी है के इस बार बेईमानी इस प्रकार से करनी है के बोलने लिखने वालों के नज़र में भी न आए. विपक्ष के रानीतिक दल केंद्र में हार का मंथन कर रहें होंगे या नई रणनीति तैयार कर रहें होंगे के विधानसभा चुनाव में क्या एजेंडा होने चाहिए.

क्या ऐसा हो सकता है के विपक्ष आने वाले चुनाव को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी कि तरह ही मतदाताओं के यहां राष्ट्रवाद धर्म जाति ही लेकर पहुंच जाए? ऐसा भी हो सकता है विपक्ष को शिक्षा रोज़गार विकास महिलाओं अल्पसंख्यक दलित आदिवासी कि सुरक्षा के मुद्दे साधारण मुद्दे लगने लगें हो?

केंद्र के चुनाव परिणाम के बाद गैर-भाजपाई मीडिया के कुछ पत्रकारों ने ईवीएम में घपला बताया है चुनाव आयोग से सवाल किए है लेकिन चुनाव आयोग ने जवाब नहीं दिए. जवाब देने वाले न्यायधीश लोया को या मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर लगे आरोप को नज़र में रखते होंगे. मैं न्यायाधीश लोया कि मृत्यु या हत्या का जिम्मेदार अभी किसी को नहीं ठहरा रहा हु मेरी अभी मरने कि इच्छा नहीं है क्योंकि मेने मौत का हक़ अभी तक अदा नहीं किया है अभी बहुत कुछ करना चाहता हु उसके लिए जिंदा रहना एक अहम शर्त है. ध्यान रहें मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई से फिलहाल मेरी कोई हमदर्दी नहीं है.

हां तो मैं कहाँ था होने वाले विधानसभा चुनाव पर अगर भारतीय जनता पार्टी भारत के राज्यों में भी अपनी सरकार बना लेती है तो राज्यसभा भी इनकी है. हम इस पर बहस कर सकते है के राष्ट्रपति सत्ता पक्ष सरकार का होता है या नहीं, मेने पढ़ा है पढ़ाया गया है राष्ट्रपति आज़ाद होता है.

लोकसभा राज्यसभा और जहां नहीं होनी चाहिए वहां भी सब जगह एक ही पक्ष है. संविधान पर हमले कि रफ्तार तो कभी हल्की नहीं थी लेकिन रफ्तार को हल्की करने के लिए कई दीवारें बीच मे मौजूद थी. अब ये दीवारें कमज़ोर नज़र आने लगी है कुछ गिर गयीं है कुछ सिर्फ ज़ाहिरी तोर पर खड़ी है.

अगर मैं कहूँ के साल ढेड़ साल में संविधान पर भारी संकट आने वाला है बड़े लेवल पर फेर बदलाव होंगे. जो अधिकार संविधान नागरिक को देता है वो अधिकार आने वाले वक़्त में नागिरक को नहीं मिलेंगे. अब कैसे अधिकार कुछ भी हो सकते है बोलने लिखने के सम्मान के खाने पीने के कुछ भी या ये भी हो सकता है के किसी भी अधिकार को इस्तेमाल करने के लिए एनओसी लेना पड़े जो सरकारी दफ्तरों, न्यायालय से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के नज़दीकी कार्यालयों से. पढ़ते हुए डर लग रहा होगा जानता हूं लगेगा डर एक स्वाभाविक प्रक्रिया है मुझे भी लगता है ऐसा कुछ भी लिखते हुए पढ़ते हुए. अब सोचना हमें है डर कर शांत बेठ जाना है गुलाम बनने के लिए ख़ेमा बदल लेना है या डरते हुए डर से आज़ादी के लिए कुछ करना है लड़ना है इखट्टा होना है नई रणनीति तैयार करनी है.

 

मोहम्मद अबुज़र चौधरी

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